मंगलवार, 30 मई 2023

अभ्युत्थानम्

उपन्यास सरस ललित गद्य वृहत्कथाओं का साहित्य प्रेमियों द्वारा रसास्वादन करने का एक मात्र साधन है। अब ये सरस ललित वृहद गद्यकथाएँ काल्पनिक हैं या वर्तमान अथवा भूत की किसी वास्तविक घटना, व्यक्ति, युग पर आधारित हैं इसका एकमेव अधिकार लेखक के पास सुरक्षित होता है और इसी के आधार पर उपन्यासों के भिन्न प्रकार हैं जिनमें से एक प्रमुख है ऐतिहासिक उपन्यास। साहित्यप्रेमी होने के नाते हमने भी पूर्व में ऐतिहासिक उपन्यास पढ़ रखे थे जो कि हिंदी के श्रेष्ठतम लेखकों की कृतियाँ थीं किंतु बड़े भाई अजीत भईया पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे हम पूर्वपरिचित हैं और इनकी प्रथम प्रकाशित रचना 'अभ्युत्थानम्' जो की एक ऐतिहासिक उपन्यास है; के 'रसास्वादन' का हमें सौभाग्य प्राप्त हुआ। किसी भी रचना की सटीक आलोचना, समालोचना या फिर समीक्षा करना सामान्य साहित्यप्रेमी अथवा पाठक के वश में नहीं होता, वह तो केवल अपनी रुचि - अरुचि व्यक्त कर सकता है। अतः पुस्तक समीक्षा का गुरुतर कार्य विद्वतजनों, व्याकरण व भाषा विशारदों के ऊपर छोड़कर हम एक सामान्य पाठक के रूप में अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। 


ऐतिहासिक उपन्यास होने के लिए सर्वाधिक आवश्यक होता है उसकी कथा का प्रख्यात् होना, पाठकों का उससे किसी न किसी प्रकार से पूर्व-परिचित होना। भला आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य के नाम से कौन अपरिचित होगा। उपन्यास का आरंभ दुश्चरित्र नन्द द्वारा मगध के सिंहासन की प्राप्ति हेतु किये जा रहे षड्यंत्रों से होता है और उसके राजा बनने, अपनी प्रजा व अपने विरोधियों के ऊपर किये गए दुराचारों से होता हुआ, चाणक्य व चन्द्रगुप्त के उदय, सिकन्दर के भारत पर आक्रमण, उसकी जय-पराजय व उसमें चाणक्य व चन्द्रगुप्त के योगदान, सिकन्दर से युद्ध में विभिन्न जनपदों के विघटन व विनाश से होकर अंतत: सभी के एकसूत्र में जुड़कर चन्द्रगुप्त के भारत के सम्राट बनने और उसके द्वारा सेल्यूकस की पराजय पर समाप्त होता है।


ऐतिहासिक उपन्यास का दूसरा महत्वपूर्ण तत्त्व है उस देशकाल का वास्तविक किंतु आकर्षक चित्रण जिसमें पुस्तक पूर्ण रूप से खरी उतरी है। पात्रों के वर्णन में उनके चरित्र के अनुसार शृंगार व वस्त्राभूषणों का विस्तृत वर्णन, उनके संवादों में भाषा के भेद के साथ-साथ आवश्यक भावभंगिमाओं का उल्लेख पाठकों को बाँधे रखता है। किताब पढ़ते - पढ़ते पाठक सहज ही मगध की राज व्यवस्था, मन्त्रिमण्डल, सेना , न्याय व्यवस्था, आन्तरिक सुरक्षा, गुप्तचर व अन्य विभागों के सभी महत्वपूर्ण आमात्यों, पदाधिकारियों व उनके दायित्वों से परिचित हो जाता है जिसे इतिहास की किताब से पढ़कर याद करना बड़ा कठिन कार्य होता है। यह लेखक की विद्वत्ता ही है कि जहाँ एक पृष्ठ पर ब्रह्मा जी, शिव जी, देवराज इंद्र, देवगुरु बृहस्पति और आचार्य शुक्र की दण्डनीतियों, श्रेष्ठ राज व्यवस्था व श्रेष्ठ राजा कैसा होना चाहिए इसपर विमर्श चल रहा है तो अगले ही पृष्ठ पर स्त्री सौंदर्य में दाँतो का महत्व और दंतक्षत के प्रकार क्या - क्या हैं ?;  इस पर।


पुस्तक के ऐतिहासिक उपन्यास होने के कारण यह बाध्यता है कि उसमें कोई तथ्यात्मक त्रुटि न हो अतः सिकन्दर के विजय अभियानों में जिस प्रकार पर्शिया, अनातोलिया, इराक, बेबीलोन, निनेवा, बैक्ट्रिया, सुग्ध आदि की भौगोलिक स्थिति, भारत भूमि में गांधार, कैकेय, अभिसार, अश्मक, वाहीक, ग्लुचुकायन, अम्बष्ठ, शिवि, कठ, यौधेय, आग्रेय, ब्राह्मणक, शूद्र, मालव, क्षुद्रक, मल्ल आदि के प्राचीन व वर्तमान नामों, सतलुज, रावी, झेलम, चिनाब, व्यास व गङ्गा आदि नदियों की दिशाओं व दूरियों की शुद्धता व मानचित्र पर उनकी शुद्ध स्थिति का अंकन अत्यंत प्रशंसनीय है। किताब की विशेषताओं में यह भी है कि यह केवल एक नीरस कथा ही कहते हुए नहीं चलती, अपितु स्थान - स्थान पर मुख्य कथानक की स्थापना के लिए आवश्यक सहयोगी कथाएँ भी हैं जो कहीं से भी बल पूर्वक आरोपित नहीं प्रतीत होती हैं। विभिन्न स्थानों पर लेखक ने विभिन्न ललित कलाओं, रत्नों, सुराओं व विद्याओं का बड़ा विशद वर्णन किया है जो कि पाठकों के ज्ञान में वृद्धि तो करता ही है साथ ही लेखक की उन विषयों की गूढ़ समझ और ज्ञान को भी दर्शाता है। उदाहरण स्वरूप यदि सिकन्दर के आक्रमण को ही लिया जाय तो सामान्यत: लोग केवल उसके पुरु / पर्वतेश्वर / पोरस से हुए युद्ध के विषय में जानते हैं और उसमें भी बहुत थोड़े लोगों को ही उस युद्ध में दोनों पक्षों द्वारा प्रयुक्त सेनाओं, शस्त्रों, व्यूहों, रणनीतियों के विषय में पता होगा, दोष लोगों का भी नहीं है; अधिकतर देखा गया है कि साहित्यकार और असैनिक इतिहासकार इतिहास के मूल अवयव 'युद्धों' के साथ बड़ा अन्याय करते हैं, उन्हें या तो अतिरंजित कर देंगे या फिर दो - चार पंक्तियों में समेट देंगे। किंतु यहाँ लेखक ने अपने उपन्यास के इस महत्वपूर्ण विषय के साथ पूर्ण न्याय किया है। यूनानी युद्ध कला, उनके शस्त्रास्त्रों, उनकी व्यूह रचनाओं, उनकी सेनाओं के प्रकार, यूनानी सैन्य संचालन के साथ भारतीय युद्ध कला, चतुरंगिणी सेना के प्रकार, आक्रमण व सुरक्षा के लिए की जाने वाली भिन्न-भिन्न प्रकार की किलेबन्दी, भली प्रकार से रक्षित दुर्गों को भेदने की कलाएँ और आमने - सामने के खुले मैदान में युद्ध के संचालन की विधियों का विस्तृत वर्णन किया है। इसके साथ - साथ युद्ध में विजय के लिए अतिआवश्यक भिन्न - भिन्न प्रकार की मन्त्र युद्ध शैलियों, आचार्य शुक्र की औशनस नीति, आचार्य मनु की मानव नीति आदि का भी उल्लेख है। कैकेयराज की रथ सेना और हस्ति सेना के विरुद्ध सिकन्दर द्वारा अपनाए गए Phalanx Formation (वज्र व्यूह), अन्य राजाओं के साथ युद्धों में Horse Shoe Trap ( अर्द्ध चन्द्र व्यूह ) का प्रयोग और उसके इन व्यूहों के प्रतिकार में कठों की चक्र शकट व्यूह रचना और इन सभी का वर्णन करते समय इन बातों का ध्‍यान रखा गया है कि विभिन्‍न सेना-विभागों में कौन-सा विभाग किस स्थान पर किस संख्‍या में होगा और कौन-कौन-से सेनानायक किन-किन मुख्‍य स्‍थानों पर खड़े रहकर सैन्‍य-संचालन करेंगे, आदि। इन सब बातों को खूब सोच-विचारकर आक्रमण एवं बचाव दोनों प्रकार की कार्यवाहियों का कुशल वर्णन करने में लेखक की कलम कहीं भी संकीर्ण नहीं हुई है और न ही कहीं कोई अतिरंजना दिखाई देती है। भारतीय ऐतिहासिक उपन्यासों में युद्धों का ऐसा सजीव चित्रण अभीतक केवल वृन्दावन लाल वर्मा द्वारा रचित 'विराटा की पद्मिनी' और 'झाँसी की रानी' में ही दिखाई देता है अन्यत्र कहीं नहीं। 

इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसमें वर्णित इतिहास से पाठक स्वंय को दूर नहीं पाता है। मूल कथानक से कहीं भी न भटकते हुए लेखक ने उन सभी कारणों का भलीभाँति उल्लेख किया है जो कि हम भारतीयों की सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठताओं के बाद भी सदा से विदेशियों द्वारा पराजय और पतन का कारण बनते आये हैं और चन्द्रगुप्त का विभिन्न संघर्षो के पश्चात सिंहासनारूढ़ होने और सेल्यूकस की पराजय तक की यात्रा में उन सभी कारणों का निदान क्या है ?, यह भी विधिवत स्पष्ट हो जाता है। पुस्तक के ऐतिहासिक उपन्यास होने के कारण इसमें भू - राजनीति, शासकीय राजनीति, कूटनीति, वीरता, छल, प्रतिशोध, दु:स्साहस, कला - संस्कृति आदि सभी के रस सम्मिलित हैं और इन सभी का पाठकों को रसास्वादन कराने के में लेखक द्वारा कहीं से कोई कृपणता नहीं की गई है। लेखक ने इसमें ऐसे समाजों और व्यक्तियों का चित्रण किया है जो सदा के लिए विलुप्त हो चुके हैं लेकिन उस वर्णन में कहीं से भी कोई ऐतिहासिक अनौचित्य नहीं है।


उपन्यास के तत्वों की दृष्टि से देखें तो एक तत्व होता है 'उद्देश्य'। यहाँ इस उपन्यास के उद्देश्य के लिये स्वामी विवेकानंद के एक व्यक्तव्य का उद्धरण ही पर्याप्त होगा। उन्होंने सन्यासी रूप में भारत का भ्रमण करते हुए, अलवर में अपने शिष्यों से कहा था कि आज तक भारत का इतिहास विदेशियों ने ही लिखा है। भारत का इतिहास अव्यवस्थित है। उसमें कालक्रम परिशुद्ध और यथार्थ नहीं है। अंग्रेजो तथा अन्य विदेशियों द्वारा लिखा गया इतिहास हमारे मनोबल को तोड़ने के लिए ही है। वह हमें दुर्बल ही बनाएगा। वे हमें हमारे दोष ही बताते हैं। जो विदेशी, हमारे तौर-तरीक़े, रीति-रिवाज, हमारे धर्म और दर्शन को बहुत कम समझते हैं, वे हमारा वास्तविक और पूर्वाग्रहरहित इतिहास कैसे लिख सकते हैं ? इसीलिए उसमें अनेक भ्रांतियाँ घर कर गई हैं। अब यह हमारे लिए है कि हम अपना स्वतंत्र मार्ग खोजें। अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें, शोध करें; और परिशुद्ध, यथार्थ, सहानुभूतिपूर्ण तथा आत्मा को उद्दीप्त कर देने वाला इतिहास लिखें। और यह ऐतिहासिक उपन्यास अपने उपरोक्त उद्देश्य की कसौटी पर शत प्रतिशत खरा उतरता है।


                   


                                      - गौरव सिंह


गुरुवार, 23 सितंबर 2021

हाइफा दिवस

आज से ठीक 103 साल पहले तुर्कों और जर्मनों ने भारतीय भालों का स्वाद चखा था। 23 सितम्बर 1918 को हुई हाइफा की लड़ाई भारतीयों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस युद्ध में भाग लेने वाले सैनिक और अफ़सर सभी भारतीय थे। ब्रिटिश राज में भारत में तीन तरह की सेनाएँ थीं; ब्रिटिश आर्मी जिसमें अधिकारी और जवान सभी ब्रिटिश होते थे, ब्रिटिश इंडियन आर्मी जिसमें अधिकारी ब्रिटिश और जवान भारतीय होते थे और तीसरी इंडियन स्टेट फोर्सेज़ अर्थात भारतीय रियासतों की सेनाएँ जिसमें अधिकारी व जवान दोनों भारतीय ही होते थे। हाइफा की लड़ाई ऐसी ही रियासतों की तीन रेजिमेंट्स जोधपुर इम्पीरियल सर्विस लैन्सर्स, मैसूर इम्पीरियल सर्विस लैन्सर्स और हैदराबाद इम्पीरियल सर्विस लैन्सर्स ने लड़ी थी। 

जोधपुर लैन्सर्स का नाम उनके अदम्य साहस, आदेश के प्रति प्रतिबद्धता और कठोर अनुशासन के कारण 'जो हुकुम'  पड़ गया था। जोधपुर लैन्सर्स 1918 में 15 वीं इम्पीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड, पाँचवी कैवलरी डिवीजन, डेजर्ट माउंटेड कोर की कमान में इजिप्ट पहुँची और कायरो में 3 महीने के प्रशिक्षण के बाद जॉर्डन की घाटी में तैनात हुई। फ्राँस में ट्रेंचो के बीच की लड़ाई से ऊब चुके घुड़सवार योद्धा किसी वास्तविक कैवेलरी चार्ज के लिए उतावले हो रहे थे और उन्हें इसका अवसर मिला 14 जुलाई 1918 को अबू तुलुल में। जोधपुर लैन्सर्स की दो स्क्वॉड्रन्स ने मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत की कमान में तुर्कों को बुरी तरह हराया। इस लड़ाई में जोधपुर लैन्सर्स के 6 सवारों को इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट और 7 को डिस्टिंग्विश सर्विस मेडल से सम्मानित किया गया। लेकिन ये केवल राजपूतों की शौर्य की बानगी भर थी।

इजिप्ट एक्सपेडिशनरी फोर्सेज के कमांडर इन चीफ़ फ़ील्ड मार्शल सर एडमण्ड एल्बेनी ने 19 सितम्बर 1918 को फिलिस्तीन और सीरिया पर आक्रमण किया। ब्रिटिश गुप्तचर विभाग को सूचना मिली कि अबू अल बहाई  (Abdu’l-Bahá) जो ब्रिटिश समर्थक है उसे तुर्की सेना ने हाइफा में बन्दी बना लिया है और उसे मृत्युदंड देने के आदेश हैं। उसकी रक्षा के लिए हाइफा पर विजय आवश्यक थी और हाइफा के सबसे निकट ब्रिटिश टुकड़ी थी जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लैन्सर्स। इन तीनों रेजिमेंट्स को हाइफा पर आक्रमण के आदेश दिए गए। 

समुद्र तट पर बसे हाइफ़ा के पूर्व व पश्चिम में माउंट कैरेमल और घाटी में किशोन नदी के कारण के कारण इसकी रक्षा करना सुलभ था और जर्मन व तुर्की सेनाओं ने बड़ी सुदृढ़ रक्षापँक्ति बनाई थी। हाइफा में प्रवेश करने के लिए माउंट कैरेमल की घाटी से होकर जाना पड़ता यह घाटी अर्थात डिफाइल (Defile) किशोन नदी के कारण और सँकरी थी। और इस घाटी से जाने वाली टुकड़ी पर माउंट कैरेमल की दोनों चोटियों पर स्थित जर्मन और टर्किश मशीनगनों की दोहरी मार किसी भी प्रकार के आक्रमण की सफलता को असम्भव बना रही थी। अतः यह निश्चित हुआ कि मैसूर लैन्सर्स सुबह दस बजे माउंट कैरेमल पर पीछे से आक्रमण कर जर्मन व टर्किश मशीनगन चौकियाँ अपने नियंत्रण में लेगी, उन्हें इस समय शेरवुड रेंजर्स अपनी तोपों से कवर फायर देंगे और 2 बजे जोधपुर लैन्सर्स डिफाइल अर्थात सँकरी घाटी को छोड़ नदी तट के किनारे चलते हुए हाइफा के प्रवेश द्वार पर आक्रमण करेंगे और उनके पीछे मैसूर लैन्सर्स उन्हें लिंकअप करेगी और हैदराबाद लैन्सर्स को आरक्षित बल के रूप में रखा गया। 

लेकिन जैसा कि कहते हैं कि "First casualty of any battle is battle plan itself." 23 सितम्बर को जब सुबह 10 बजे मैसूर लैन्सर्स ने कैरेमल माउंट पर पीछे से चढ़ाई शुरू की तो इतनी खड़ी चढ़ाई थी कि उन्हें अपने घोड़े पीछे छोड़ने पड़े, चढ़ाई इतनी कठिन थी कि उन्हें निश्चित समय से अधिक समय लग रहा था, इधर जोधपुर लैन्सर्स जो मैसूर लैन्सर्स के सकेंत की प्रतीक्षा कर रही थी उसे 2 बजे आक्रमण के आदेश थे अतः संकेत न मिलने पर भी मेजर दलपत सिंह ने आक्रमण के निर्णय लिया और अपने घुड़सवारों को लेकर पहले से तय रास्ते के अनुसार किशोन नदी तक पहुँचे, उनके ऊपर 77 एमएम की तोपों और मशीनगनों से भारी गोलाबारी हो रही थी, नदी की रेत दलदली थी और गहराई के कारण घोड़ों की पीठ पर उसे पार करना असंभव था। अब उनके पास एक ही मार्ग था पीछे मुड़कर पुनः सँकरी घाटी से होकर निकलना। निःसन्देह यह कदम आत्मघाती था लेकिन राजपूत मृत्यु के भय से रणभूमि नहीं छोड़ते। डिफाइल के रास्ते से निकलने के लिए आवश्यक था कि उसपर तैनात मशीनगनों चौकियों को पहले निष्क्रिय किया जाय। जोधपुर लैन्सर्स के वापस मुड़कर डिफाइल तक आने के क्रम में ही मेजर दलपत सिंह मशीनगन की गोलियों के शिकार हो गए। गोलियाँ उन्हें रीढ़ की हड्डी में लगी थीं। कैप्टन ठाकुर अमन सिंह जोधा जो जोधपुर लैन्सर्स की सबसे अनुभवी और पुराने जोधा राठौर सवारों की बी स्क्वॉड्रन कमान कर रहे थे उन्होंने रेजिमेंट की कमान सम्हाली और डिफाइल पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में लिया, डिफाइल के अधिकार में आते ही डी स्क्वॉड्रन कमान कर रहे कैप्टन ठाकुर अनूप सिंह ने अपने सवारों के साथ डिफाइल से आगे बढ़कर माउंट कैरेमल पर पूर्व की ओर से आक्रमण कर वहाँ की मशीनगन चौकियों को निष्क्रिय करते हुए 30 शत्रु सैनिकों को अपने भालों से मार गिराया। शत्रु की शेष मशीनगन चौकियाँ अबतक मैसूर लैन्सर्स के भालों का शिकार हो चुकी थीं। अब कैप्टन अनूप सिंह और कैप्टन अमन सिंह ने अपनी दोनों स्क्वॉड्रन्स को सीधा हाइफा की ओर मोड़ दिया, कमांडिंग ऑफिसर मेजर दलपत सिंह को गोली लगने का समाचार फैल चुका था और सवारों के क्रोध की सीमा नहीं थी। ठीक सामने से आती जर्मन और टर्किश मशीनगनों की गोलियों की बौछार भी उन्हें नहीं रोक सकी, अपने युद्ध घोष रणबाँका राठौर ('The Rathore - Invincible in Battle') की गर्जना करते हुए अपने भालों की नोंक आगे किये ऐसे आक्रमण किया मानो बिजली गिर पड़ी हो। उनके हाइफा तक पहुँचते पहुँचते मैसूर लैन्सर्स भी माउंट कैरेमल से जर्मनों और तुर्कों को मारकर नीचे उतर जोधपुर लैन्सर्स से आ मिले। यह संयुक्त आक्रमण इतना त्वरित, घातक और अकल्पनीय था कि शत्रुओं को पूरी तरह सम्हलने के अवसर भी नहीं मिला, तुर्कों और जर्मनों की लाशें भालों से बिंधी, घोड़ों की टापों से कुचली हुई हाइफा की सड़कों पर पड़ी हुई थीं। इस युद्ध में मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत को मरणोपरांत व कैप्टन ठाकुर अनूप सिंह और सेकेंड लेफ्टिनेंट सगत सिंह को मिलिट्री क्रॉस, कैप्टन अमन सिंह और दफादार जोर सिंह को इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया। 

जोधपुर लैन्सर्स और उसके कमान अधिकारी मेजर दलपत सिंह शेखावत के सम्मान में फील्ड मार्शल सर एडमण्ड एल्बेनी ने लिखा


"Whilst the Mysore Lancers were clearing the rocky slopes of Mount Carmel, theJodhpur Lancers charged through the defile, and riding over the enemy's machine guns, galloped into the town, where a number of Turks were speared inthe streets. Maj. Thakur Dalpat Singh, M.C., fell gallantly leading the charge."1,350 enemy prisoners were taken, including 2 German and 35 Ottoman officers. The Jodhpur and Mysore Lancers combined lost 1 officer, 7 soldiers and 60 horses. 6 officers and 28 soldiers were wounded, as were 83 horses.“No more remarkable cavalry action of its scale was fought in the whole course of the campaign. Machine gun bullets over and over again failed to stop the galloping horses even though many of them succumbed afterwards to their injuries.."


The Official History of the War (Military Operations Egypt and Palestine: VolumeII)


एक अन्य ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर कर्नल हार्वी ने ने दलपत सिंह के लिए लिखा 

"His death is a loss not only to all Jodhpuris, but to India and the whole of the `British Empire'. The British Government eulogised his heroic deed and adored him as Hero of Haifa."

 प्रथम विश्वयुद्ध जहाँ आधुनिक शस्त्रों से लड़ा जा रहा था, शत्रु मशीनगनों और तोपों से सज्जित था और विधिवत युद्ध के लिए तत्पर था वहाँ जोधपुर लैन्सर्स का घोड़ो पर सवार हो केवल अपने भालों के दम पर सीधा आक्रमण कर अपने से सँख्या व बल में अत्यधिक शत्रु को बुरी तरह रौंद देना भारतीय सैनिकों के साहस और वीरता का एक नया प्रतिमान था। आधुनिक युद्ध में यह अंतिम घुड़सवार आक्रमण था जो अपने से संख्या, शस्त्र व बल में अधिक शत्रु के ऊपर सफल हुआ।

स्वतंत्रता के पश्चात सभी स्टेट फोर्सेज़ का भारतीय सेना में विलय हो गया और सन 1953 में जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लैन्सर्स तीनों रेजिमेंट्स को एक में मिलाकर नई रेजिमेंट बनाई गई 61 कैवेलरी। 61 कैवेलरी का प्रतीक चिन्ह मैसूर लैन्सर्स के प्रतीक चिन्ह से लिया गया। 23 सितम्बर को प्रतिवर्ष भारतीय सेना हाइफा दिवस के रूप में मनाती है। दिल्ली का त्रिमूर्ति चौक, मैसूर लैन्सर्स मेमोरियल, बंगलौर, इम्पीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड मेमोरियल, दिल्ली और हाइफा मेमोरियल, इजराइल; इस युद्ध में बलिदान हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि व स्मरण स्वरूप बनाये गए हैं।


गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

बागी

वह बागी था! गुलाम, पराधीन, परतन्त्र भारत का पहला बागी। जब सारे राजे - रजवाड़े, सूरमा, योद्धा या तो अंग्रेज़ो की दासता में मस्त थे या फिर अपने हित के लिए संघर्ष रत; तब उसने सबके लिए पहली गोली दागी थी, उसे अंग्रेजो ने जब फाँसी देनी चाही तो पूरे कलकत्ते में कोई जल्लाद नहीं मिला जो उसे फाँसी पर लटकाने को प्रस्तुत हो। उसके बाद उसके सगे-सम्बन्धियों को अंग्रेजों ने तोप के मुँह पर बाँध कर उड़ा डाला लेकिन उसके बलिदान ने हिंदुस्तानी सैनिकों में विद्रोह की वह अग्नि भर दी कि उन्होंने गोलियां खत्म होने पर जँगली पौधे 'Canna Indica' (सर्वज्जय, कर्दळ, केंळें फुल) के बीज बन्दूकों में भरकर लड़ाई लड़ी और यह पौधा 'Indian shot' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। बलिया के नगवां गाँव में १९ जुलाई १८२७ को जन्मे उस भूमिहार ब्राह्मण हिन्दू युवक ने जब १८४९ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की बंगाल प्रेसिडेंसी आर्मी ज्वॉईन की थी तो किसने सोचा था कि एक दिन वही स्वतंत्रता के यज्ञ में पहला हविष्य डालेगा। कुछ लोग और इतिहासकार कहते हैं कि ५७ की क्रांति धार्मिक कारणों से और व्यक्तिगत लाभों के लिए थी। वे यह भूल जाते हैं कि ५७ के विद्रोह की पहली गोली उसने उसी एनफील्ड राईफल से दागी थी और जैसे ही उसने चर्बीदार कारतूस अपने मुँह से काटकर बन्दूक भरी; वह विद्रोह सैनिक, धार्मिक या व्यक्तिगत लाभ का न रहकर देश की स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम बन गया था। उसके बलिदान के बाद सन् ५७ के बागी सिपाही उसके उपनाम ' पाण्डे ' से जाने जाते थे और गर्व महसूस करते थे। ५७ की क्रांति के उस पुरोधा का परिचय यह रहा -

नाम - मंगल पाण्डेय, सिपाही नम्बर - १४४६, ५ वीं कम्पनी, १९ वीं पलटन/बटालियन, ३४ बंगाल नेटिव इन्फैंट्री रेजिमेंट, मुकाम - बैरकपुर छावनी, बंगाल कमांड, कलकत्ता। भारतीय स्वातन्त्र्य समर के अग्रदूत अमर बलिदानी स्वर्गीय मङ्गल पाण्डेय की पुण्यतिथि पर उन्हें कृतज्ञ हृदय से श्रद्धांजलि ! 🇮🇳🇮🇳

शनिवार, 16 जनवरी 2021

स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर

सावरकर जी के विषय में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने खुले मंच से कहा था -

"सावरकर माने तेज,

सावरकर माने त्याग,

सावरकर माने तप, 

सावरकर माने तत्व, 

सावरकर माने तर्क, 

सावरकर माने तारुण्य, 

सावरकर माने तीर, 

सावरकर माने तलवार, 

सावरकर माने तिलमिलाहट,

सावरकर माने सागराप्राणतलमला, 

सावरकर माने तितिक्षा, 

सावरकर माने तीखापन, 

सावरकर माने तिखत।

कैसा बहुरंगी व्यक्तित्व था उनका।"


 २८ मई १८८३ को नासिक में जन्मे सावरकर की माता का ७ वर्ष और पिता का १६ वर्ष की आयु में देहावसान हो गया। बड़े भाई बाबा राव ने उनका पालन पोषण किया। १९०१ में मैट्रिक पास करने के बाद उनका विवाह यमुना बाई से हुआ। विवाह के पश्चात सावरकर पुणे के प्रतिष्ठित फ़र्ग्यूसन कॉलेज से स्नातक कर लॉ की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। वह चाहते तो बैरिस्टर बन अथाह सम्पत्ति अर्जित कर आलीशान जीवन व्यतीत कर सकते थे किंतु माँ भारती के उस यशस्वी पुत्र के जीवन का एकमात्र ध्येय मातृभूमि की सेवा था। बाल्यकाल में मित्र मेला नामक संगठन की स्थापना कर चुके सावरकर ने १९०४ में ब्रिटेन में अभिनव भारत का गठन किया जिसका उद्देश्य ही भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष था। सावरकर १९०५ में बंग भङ्ग आंदोलन में भागीदार बने और इंग्लैंड में ही लाला हरदयाल से मिले जो लंदन में क्रांतिकारियों के गढ़ इंडिया हाउस के संचालक थे। १९०७ में सन् सत्तावन के विद्रोह की स्वर्णजयंती पर उन्होंने इंडिया हाउस में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया। अपने लंदन में रहने के दौरान ही उन्होंने ब्रिटिश लाइब्रेरियों व संस्थानों से खोज खोज कर तथ्य एकत्रित किये और उस पुस्तक की रचना कर डाली जिसे 'क्रांतिकारियों की गीता' कहा गया। मात्र २५ वर्ष की आयु में सन् १९०९ में विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी कालजयी रचना '1857- The Independence war of India'  लिख डाली। वह जानते थे कि ब्रिटिश हुकूमत किसी भी कीमत पर इस किताब को छपने नहीं देगी अतः उन्होंने मूलतः मराठी में लिखी इस किताब की तीन प्रतियां तैयार कीं जिसमें से एक प्रति उन्होंने अपने बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर के पास भारत भेजी, दूसरी प्रति फ्राँस में मैडम भीका जी कामा के पास भेजी जहाँ मैडम कामा और लाला हरदयाल ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया और तीसरी प्रति अपने मित्र डॉक्टर कुटिन्हों के पास। यह किताब छपने से पहले ही प्रतिबंधित हो गयी और भारत के स्वतंत्र होने पर लिखे जाने के ३८ वर्ष पश्चात सार्वजनिक रूप से सामने आई। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इस किताब ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया इसका अंदाज़ा केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि इसी किताब की प्रेरणा से गदर पार्टी की स्थापना हुई, शहीदे आज़म भगत सिंह ने इसे राजाराम शास्त्री की सहायता से छपवाया और साथी क्रांतिकारियों में वितरित कर दिया, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन व रास बिहारी बोस जैसे नेता भी इस किताब से बड़े प्रभावित हुए। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने इस किताब के तमिल संस्करण छपवाए। 


सावरकर का स्वयं का आज़ादी के संघर्ष में क्या योगदान था यह केवल इस प्रसङ्ग से समझ में आ जाता है कि दुर्गादास खन्ना नामक पूर्व क्रांतिकारी जो बाद में कॉंग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद दिए अपने साक्षात्कार में कहा कि जब वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में भर्ती होने गए तब स्वयं भगत सिंह और सुखदेव ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने विनायक दामोदर की रचित 1857 The Independence war of India और विनायक सावरकर की जीवनी 'Life of a Barrister'  पढ़ी है?

१ जुलाई १९०९ को जब मदनलाल धींगरा ने लंदन में कर्ज़न वायली का वध कर अपनी गिरफ्तारी दे क्रांतिकारियों के सरताज़ बन गए तब सावरकर ने उनके समर्थन में लंदन टाईम्स में लेख लिखा। १३ मई १०१० को सावरकर पहली बार गिरफ्तार हुए और ८ जुलाई १९१० को गिरफ़्त से फरार । उनकी दूसरी गिरफ्तारी के बाद २४ दिसम्बर १९१० को उन्हें पहला आजीवन कारावास, ३१ जनवरी १९११ को पुनः आजीवन कारावास, ७ अप्रैल १९११ को कालापानी की कठोर सजा सुनाई गई। ब्रिटिश सरकार ने उनकी सम्पत्तियां जब्त कर लीं, दो-दो आजीवन कारावास और कालापानी का कठोरतम दण्ड दे दिया। सावरकर अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिए गए और वहाँ भी इस सिंह पुरूष ने जेल के अंदर बम बनाने का षड्यंत्र रच दिया। इस रिपोर्ट पर गृह विभाग ने रेज़नॉइल क्रेडॉक नामक अधिकारी भेजा जिसने सावरकर से भेंट के उपरांत अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में लिखा कि सावरकर को अपने किये पर कोई पछतावा नहीं है।


सावरकर के ऊपर अक्सर वामपंथियों और काँग्रेस के नेताओं द्वारा आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने जेल में रहने के दौरान अंग्रेज़ो से क्षमायाचना की और बार-बार माफ़ी माँगी। दरअसल जब लोग यह झूठे आरोप लगाते हैं तो वह यह भूल जाते हैं कि अंडमान जेल का एक Penal Code था जिसका पालन सावरकर और अन्य क्रांतिकारी नेताओं या कार्यकर्ताओं के ऊपर नहीं किया जाता था। सावरकर लॉ के विद्यार्थी रह चुके थे। कानूनी दांवपेंच जानते थे और उनका सदुपयोग करते थे। उनके पत्रों में सारे कैदियों के हितों की बात की गई है एक General Amnesty की माँग करते हैं वो जिसमें बार-बार यह पूछा गया है ब्रिटिश सरकार से की यदि वे सभी राजनैतिक कैदी हैं तो उनके साथ राजनैतिक कैदियों जैसा व्यवहार हो, उन्हें पढ़ने लिखने को अखबार व कागज़ उपलब्ध कराए जाएँ। कोल्हू में जुतने, पत्थर तोड़ने जैसे कार्यों से विरत रखा जाय, परिवार के लोगों से मिलने और उन्हें पत्र लिखने की अनुमति व साधन दिए जाएं जाएँ और यदि सरकार की दृष्टि में सश्रम कारावास के आरोपी सामान्य कैदी हैं तो उन्हें कम से कम उन सामान्य कैदियों को मिलने वाली सुविधाओं को दिया जाय। सावरकर अंडमान जेल में कैदियों के बीच ब्रिटेन से पढ़कर आये जानकार क्रांतिकारी 'बड़ा बाबू' और 'फिरंगी बाबू' के नाम से प्रसिद्ध थे। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि अपना जीवन कैद में गंवाने से अच्छा है कि बाहर निकल स्वातंत्र्य समर में जो आहुति दी जा सके वह दी जाय। और इसके लिए वह सदैव प्रयत्न करते रहे। जेल से रिहाई को लेकर उन्होंने अपने १९१७ के पत्र में लिखा है "If my name constitutes obstacle to the release of other prisoners than you can delete my name and release others and that will give me as much pleasure as my own release would actually give." प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल ने अपनी आत्मकथा 'मेरा बन्दी जीवन' में लिखा है कि मैंने सावरकर जी की सलाह पर याचिका दायर की और मुझे छोड़ दिया गया। मैंने जो पत्र लिखा था ठीक वही पत्र सावरकर बंधुओ ने भी लिखा था किंतु उन्हें रिहाई नहीं मिली। ब्रिटिश सरकार को भय था कि कहीं सावरकर की रिहाई से बॉम्बे प्रेसिडेंसी में सशस्त्र विद्रोह की आग फिर से न जल उठे! सन् १९२० में जब सावरकर के सबसे छोटे भाई नारायण राव गाँधी जी से मिले और उनसे अनुरोध किया कि वह उनके दोनों बड़े भाईयों की मुक्ति के लिए कुछ प्रयत्न करें तो गाँधी जी ने नारायण राव से कहा कि वह अपने भाईयों को दया याचिका डालने को कहें और स्वयं गाँधी जी ने भी सावरकर बन्धुओं की ओर से याचिका डाली की गणेश राव सावरकर और विनायक सावरकर को छोड़ दिया जाय क्योंकि मांटेग्यू चेम्शफ़ोर्ड सुधारों के आने के पश्चात सशस्त्र क्रान्ति की आवश्यकता नहीं रही है और सावरकर बंधु सशस्त्र क्रांति नहीं करेंगे बल्कि काँग्रेस से जुड़ेंगे या अहिंसक आंदोलनों में भाग लेंगे। अंडमान जेल से बाहर आने के बाद सावरकर का स्वास्थ्य गिर चुका था। पेट की बीमारी व अर्थराइटिस के कारण वह शारीरिक रूप से क्रांतिकारी जीवन व्यतीत करने में अक्षम थे उनका शरीर अक्षम था किंतु मष्तिष्क नहीं। सावरकर के घर में दुर्गा भाभी और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों को शरण मिली। जेल से लौटने के बाद क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्त न होने का छद्म दिखावा करते हुए सावरकर ने जहाँ छिपे रूप में क्रांतिकारियों की हर सम्भव सहायता की तो वहीं उन्होंने समाज सुधार के बहुत से कार्य किये। जातिगत छुआछूत व भेदभाव मिटाने के लिए उन्होंने जागरूकता अभियान चलाया और १९३१ में 'पतित पावन मन्दिर' नामक कैफ़े खोला जहाँ सभी जातियों के व्यक्ति साथ बैठकर भोजन व जलपान कर सकते थे। जातिप्रथा के घनघोर विरोधी व अंतरजातीय विवाहों के समर्थक सावरकर ने जेल से ही शुद्धि आंदोलन चलाया जिसमें उन्होंने मजबूरी या किसी प्रताड़ना वश जबरन मुसलमान बनाये गए हिंदुओ को पुनः सनातन धर्म में वापस लिया। महाराष्ट्र की रत्नागिरी जेल में लिखी उनकी हिंदुत्व नामक किताब में जहाँ उन्होंने हिन्दू राष्ट्र की सँकल्पना की है तो उस हिन्दू राष्ट्र में मुसलमानों या अन्य किसी अल्पसंख्यक को दूसरे दर्ज़े का नागरिक नहीं बताया है अपितु उन्हें वो सभी अधिकार देने की बात की है जो एक स्वतंत्र व सम्प्रभुतासम्पन्न देश के नागरिक को प्राप्त होते हैं। सावरकर का हिंदुत्व धर्म से कहीं अलग हटकर सांस्कृतिक व राजनैतिक दर्शन के रूप में था।


स्वतंत्र भारत में सावरकर को गाँधी जी की हत्या के मुकदमे में फँसाया गया। उनकी सम्पत्ति व डिग्री जब्त कर ली गयी। परिवार के सभी पुरूष जेल में डाल दिये गए। उनकी पत्नी यमुना बाई व भाभी येशु बाई को हत्यारों की पत्नी कहकर अपमान और सामाजिक बहिष्कार किया गया। जीवनयापन का कोई साधन नहीं था तब मैडम भीका जी कामा ने पेरिस से पैसे भेजे जिनसे उनका घर चला। पंडित नेहरू सावरकर से इतना चिढ़ते थे कि उन्होंने उनके साथ कभी मंच साझा करना तक उचित न समझा और घोषणा कि की वह अंडमान जेल तुड़वा कर वहाँ अस्पताल बनवाएंगे लेकिन पंडित नेहरू का देहावसान हो गया और उनके बाद जब शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने सावरकर को स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन देनी प्रारम्भ की। गाँधी जी की हत्या के मुकदमे से बरी होकर लौटे सावरकर को १९५९ में पुणे विश्वविद्यालय ने डी० लिट्० की मानद उपाधि से अलंकृत किया। नवम्बर १९६३ में उनकी पत्नी का देहावसान हुआ और सितंबर १९६५ में बीमार पड़े और जब स्थिति ज्यादा गम्भीर हुई तब इस महामानव ने अन्न-जल व औषधि का त्याग कर दिया और २६ फरवरी १९६६ को प्राण त्याग दिए। माँ भारती के इस सपूत की मृत्यु पर न तो महाराष्ट्र सरकार के एक भी मंत्री शोक व्यक्त करने पहुँचे और न तो कोई केंद्र से आया। लोकसभा स्पीकर ने तो सांसदों के सावरकर को श्रद्धांजलि देने के प्रस्ताव को ही ख़ारिज कर दिया। वाई बी चव्हाण जब देश के गृहमंत्री के रूप में अंडमान गए तो उन्होंने सावरकर जिस सेल में बंद थे वहाँ जाना भी उचित नहीं समझा और उनके बाद मोरार जी देसाई भारत के प्रधानमंत्री रहते हुए अंडमान गए तो उन्होंने भी सावरकर को श्रद्धांजलि तक न दी। सावरकर के बारे में गाँधी जी ने यंग इंडिया में एक लेख लिखते हुए उन्हें 'a faithful son of Bharat... brave, clever and frankly, a revolutionary' कहा। उनकी मृत्यु के पश्चात जब स्वर्गीय इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं तो उन्होंने स्वातंत्र्य वीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक के सेक्रेटरी पण्डित बाखले को २० मई १९८० को लिखे पत्र में सावरकर के विषय में लिखा है


“I have received your letter of 8th May 1980. Veer Savarkar’s daring defiance of the British Government has its own importance in the annals of our Freedom movement. I wish success to the plans to celebrate the birth centenary of the remarkable son of India."


सावरकर ने अपनी आत्मकथा में कहा था कि आज के समय में भले ही मेरे विचारों से लोग सहमत न हों किंतु मेरा मत मेरे जाने के वर्षों बाद अवश्य स्वीकार्य होगा। और देखा जाए तो ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी, बड़े कारखानों, वैश्विकरण, मजबूत अर्थव्यवस्था और औद्योगिक क्रान्ति की जो कल्पना उन्होंने की थी आज भारत वहीं अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय विषयों पर वह सदैव स्पष्ट व प्रभावी विदेशनीति के पक्षधर थे, इज़राइल से मित्रता व देश की बाह्य व आन्तरिक शत्रुओं से रक्षा हेतु एक शक्तिशाली व बड़ी सेना की आवश्यकता की उन्होंने सदैव वकालत की। शत्रु दमन के विषय में वह स्पष्टत: कहते थे 'Get inside the enemy camp and beat them black and blue.' और भारत ने १९७१ के युद्ध, सियाचीन के ऑपरेशन मेघदूत, म्यांमार व POK में सर्ज़ीकल स्ट्राईक और बालाकोट में एयरस्ट्राईक करके यही तो किया है।


सावरकर का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वह ऐसे दार्शनिक हैं जिसके दर्शन में तर्कवाद के साथ उपयोगितावाद, सकारात्मकवाद, मानववाद, यथार्थवाद व सार्वभौमिकता का अद्भुत सँगम है। सावरकर एक महान चिंतक, लेखक, वक्ता, दूरदर्शी राजनेता, प्रखर देशभक्त, राष्ट्रवादी, क्रांतिकारियों के नायक और ऐसे कवि हैं जो बन्दी जीवन में कारागार की दीवारों पर नाखूनों से कविता लिखता था। जेलर यातना देने के लिए उस कवि के एकाकी की साथी उन कविताओं पर सफेदी पुतवा देता और सावरकर फिर अपने नाखूनों से कविता लिख देते। जब कालेपानी से छूटे तो रत्नागिरी की आंशिक कैद मिली और फिर जिस जननी जन्मभूमि की स्वतंत्रता हेतु ऐसे कठोरतम दुःख झेले थे उसकी स्वतंत्रता के पश्चात उसकी आँचल की ममतामयी छाँव व घावों पर स्नेहलेप की जगह पुनः मिला भी तो क्या मिला माँ भारती के इस लाल को! प्रथम तो झूठा अभियोग व कारागार, अभियोग से मुक्त होने पर राजनैतिक प्रतिशोध के कारण आंशिक कारगर व मृत्यु के बाद भी अपने ही लोगों से अपमान, घृणा व पक्षपात के कड़वे घूँट। 


माँ भारती के वीर पुत्र स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर को इस कृतज्ञ भारतवासी की सादर श्रद्धांजलि!!



  • गौरव सिंह


शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

कामरेड

तब सोनभद्र मिर्ज़ापुर से बंटकर अस्तित्व में न आया था और सारे सरकारी काम मिर्ज़ापुर से ही संचालित होते थे। सुदूर दक्षिणांचल में घाट उतरकर सोन नदी के पार रेण और बिजुर नाम की पहाड़ी नदियों से घिरे जंगलो में बसे इलाके में एक गाँव था राजापुर ।

ठाकुर रावणेश्वर सिंह गाँव क्या; पूरे इलाके के जाने-माने आदमी थे। नाम के अनुरूप काया थी, अच्छा-खासा साढ़े छः फुट का कसरती शरीर, भरा हुआ चेहरा, गौरवर्ण, बिल्लौरी आँखे और रौबीली मूँछे। बल भी अथाह था, नागपंचमी के दिन अखाड़े में उतर जब ताल ठोंकते तो मजाल की कोई पहलवान टिक जाये! कुड़ारी में माँ दुर्गा के मंदिर में बलि दी जाती थी नवरात्रि पर और रावणेश्वर सिंह एक हाथ में भैंसे का सिर अलग कर देते थे।

ठाकुर साहब क्षेत्र के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनके पास बुलेट मोटरसाईकिल और फ़ोर्ड की जीप हुआ करती थी। पर हर तरह से साधन सम्पन्न होने के बाद भी अहं उनको छू भी न पाया था और यही वजह थी कि क्षेत्र में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी ।

हरिया मल्लाह उनका ख़ास आसामी था। सोन की बाढ़ ने उसका सबकुछ छीन वृद्धा माँ, पत्नी और कन्या लौटा दिए थे। ठाकुर ने हरिया को आश्रय और सम्मान दिया तो वह भी जहाँ उनका पसीना गिरे वहाँ अपना खून गिराने को तैयार रहता। 


तब दरवाजे पर ट्रैक्टर खड़ा होना सम्पन्नता और बड़े आदमियत की निशानी मानी जाती थी। लोग रशियन डीटी - २८ और मेड इन इंग्लैंड इंटरनेशनल को दरवाजे पर खड़ा कर बाँह फुलाते थे फिर जिसके पास फ़ोर्ड था वह तो हल-बैल वालों को जरा भी न पतियाता। लेकिन इसके बाद भी ठाकुर साहब के खेत बैलों के माथे थे। जब - तब वो असामियों से चुहल करते - "काs..हो जीतन..s.., ए हरिया; सोच रहे हैं हमहूँ एक ठो डीटी -२८ मँगवा लें, गज़ब मशीन है रजा ! हाथ भर का कूँड़ काटती है महराज; जोतनी-बोवनी का टाईम 20 दिन घटा दे।"

और इतना सुनते ही जीतन और हरिया की नानी मर जातीं, चीख मारकर कहते "सरकार हमहीं लोग आप के 'टेक्टर' हैं; कल से चार हल और बढ़ जायेगा।"

ठाकुर सुनते और ठठाकर हँसते हुए कहते "ठीक है भाई, जाओ नहीं आएगा ट्रैक्टर।"


हरिया की लड़की कि शादी थी। बारात ठाकुर साहब के बगीचे में रुकी, बारातियों ने इतनी गज़ब की व्यवस्था कहीं न देखी थी। खान-पान, आवभगत और सुविधा की बड़ाई आपस में ही गाते न थकते थे कि गज़ब हुआ, द्वारपूजा के समय रावणेश्वर सिंह ने अपनी राईफल से 11 फ़ायर किये और वर-कन्या के पाँव छू १०१ रुपये कुर्ते से निकाल रख दिए। लोग बाग दंग थे कि इतना बड़ा आदमी और ये सद्भाव! हरिया तो पैरों में ही लोट जाता अगर वह बिगड़ कर न कहते "अरे खड़े रहो चुपचाप; वर-कन्या साक्षात् विष्णु और लक्ष्मी का रूप होते हैं! सब पुन्य तुम अकेलहीं खाओगे क्या ...?"


पहली बार ऐसा था जब लोगों को रावणेश्वर सिंह के बजाय हरिया से ईर्ष्या हुई। बड़ी-छोटी हर जाति का आदमी कहता - फिरता "केवल कहने भर को ससुरा मल्लाह है; वरना बाऊ साहब तो पूरा कपार पर चढ़ा रखे हैं। एक पंडित जी बोले - "कहीं एक दिन अपनी थाली में भात खिलाकर यह न कह दें कि हरिया आज से तुम ठाकुर हो। ठाकुर हरिनारायण सिंह चंदेल।" एक दूसरे ठाकुर ने बात काटी और बोला - "ऐसा करेंगे तो जाति से बाहर न हो जाएँगे!" पंडित जी बोले - "कौन करेगा जाति से बाहर ? राजा साहब बड़हर से कितनी बनती है उनकी!" 

इसी तरह की तमाम कुढ़ने वाली निर्रथक चर्चाएँ नित्य होकर समाप्त हो जातीं और लोग निंदा कर अपने मन का गुबार शांत कर लेते।


२-३ साल बाद की बात है, क्षेत्र में लाल सलाम कि सुगबुगाहट होने लगी थी। कम्युनिज्म यानी साम्यवाद का लाल दानव सबकुछ निगलने को तैयार होने लगा था। जहाँ-तहाँ लाल झंडे और पर्चे दिख जाते। बीहड़ों में चरवाहों और सूने रास्तों पर राहगीरों को अक्सर मुँह बाँधे हथियार बन्द लोग मिल जाते, जो दावा करते थे खुद के उनका मसीहा होने का और अमीरी-गरीबी की खांई पाटने का। 

दो-चार छिटपुट घटनाएँ भी हुईं पर सबकुछ शांत ही रहा शुरू में, लेकिन एक दिन एक पुलिसवाले ने एक मल्लाह लड़की को पकड़ा, पर खेतों में काम कर रहे लोगों की सजगता से वह बालिका बच गयी। पुलिसवाले को मार-पीट भगाने के बाद लोग बालिका के माँ-बाप समेत ठाकुर साहब के पास पहुँचे। चूंकि साँझ ढल आई थी इसलिए उन्होंने अगले दिन कोतवाली जाने की जिम्मेदारी स्वयं पर लेकर उन्हें वापस लौटाया और सोये तो सुबह खबर मिली कि उस थानेदार की गला रेतकर हत्या हो चुकी है और बाकी पुलिसवाले थाने में नंगा कर बाँध कर पीटे गए हैं। लोगों का एक बड़ा वर्ग इस त्वरित न्याय से बड़ा प्रभावित हुआ; पर आने वाले विप्लव का अनुमान किसी को न था । 


शाम होते-होते डीएसपी और नगर कोतवाल अपने दल-बल के साथ गाँव पहुंचे, जम कर दारू-मुर्गा काटा, थोड़ा जंगलो की सैर की और लौट गए पर चिंगारी अब भड़क चुकी थी । 

नित्य नई घटनाएँ होतीं । कई बार पुलिसवाले मारे गए, सवर्णों की हत्यायें शुरू हो गयीं । जहाँ-तहाँ लाल झंडे दिख जाते तो कहीं गाँवो में पोस्टर। लोगों में लाल सलाम का नाम और डर सर चढ़ कर बोल रहा था। सवर्णों के मन में भी दिन पर दिन कटुता बढ़ी ही जाती थी अन्य जातियों के लिए।

स्थितियाँ हाथ से निकलती देख प्रशासन ने नगर कोतवाल और डीएसपी का तबादला कर दो नए अधिकारी भेजे; मुहम्मद सलीम और बीरबल पाण्डेय। दोनों पूरे राहु-केतु थे, चित्रकूट के बीहड़ों का कोई ऐसा गिरोह न था जो पानी न माँग गया हो ये दो नाम सुनकर। जाने कितने दस्यु सरगना इनकी बंदूक से निकला बारूद चाट मीठी नींद सोये थे। 

दोनों ने आते ही पूरा इलाका छान मारा। गाँव-जवार की खबर ली, मुखबिर छोड़े और पुरानी घटनाओं की पड़ताल कर तथ्य निकाले तो खुद काँप उठे। डकैतों का अलग गिरोह होता है; उनमें परस्पर शत्रुता होती है, आप कुछ न कर पा रहे हों तो उन्हें आपस में लड़ा दीजिये। जब खुद लड़कर मर जाएँ तो बचे-खुचों को आप समाप्त कर दीजिये। किन्तु यहाँ तो पूरा संगठन खड़ा था नक्सलियों का। जो पोषित था तन, मन, धन से, और इसकी जड़ें कहाँ थीं किसे पता ..?


बीरबल और सलीम ने मन्त्रणा की, इतने कच्चे खिलाड़ी न थे अतः सामना करने का निश्चय किया और बिना बाहरी दिखावे के अंदर ही अंदर सेंधमारी का काम शुरू कर दिया। 


एक दिन ऐसे ही मुखबिर ने कुछ सूचना दी और दोनों रावणेश्वर सिंह के घर पहुँचे। भेंट हुई, चाय-नाश्ते का दौर चला, दुनिया - जहान की बातों में ही हरिया दिखा तो उसकी भी पूरी कहानी ठाकुर ने उन्हें बता दी। अब तक शाम हो आई थी, दोनों ने वापसी की तैयारी की तो ठाकुर ने रात्रि भोजन तक रुकने का आग्रह किया। दोनों रुक गए, गाँव में घूमे, दो-चार आदमियों से बातें कि, शक और पुख़्ता हुआ। 

भोजनोपरांत जब दोनों चलने लगे तो बीरबल ने ठाकुर से कहा, "बाबू साहब इलाके के हर सवर्ण और धनी आदमी पर हमला हुआ या लेवी ली गयी; आप कैसे बच गए? सावधान रहिएगा!"


बीरबल और सलीम तो ताक़ीद कर लौट आये पर ठाकुर साहब ने उनकी बातों को यूँ ही हवा में उड़ा दिया। अगले दिन रात्रि भोजन के बाद ठाकुर साहब बगीचे की ओर निकल गए। अँजोरिया रात थी, घूमफिर कर करीब घण्टे भर बाद लौट रहे थे। सावन का महीना था और सोन पूरे उफ़ान पर थी जिसकी वजह से नाले भी चढ़े हुए थे। ठाकुर गाँव के दक्षिण वाले नाले के करार पर से हाथ में टार्च और लाठी लिए अलमस्त स्वर में आल्हा का मनपसन्द छंद "... जिस दिन आल्हा जनम लियो, धरती धँसी अढ़ाई हाथ....." गाते हुए लौट रहे थे कि लगा पास वाली बँसखार के पीछे कोई है। दहाड़कर बोले कौन है और चार कदम आगे बढ़ टॉर्च की रोशनी मारी तो देखा हरिया 4-5 लोगों के साथ बैठा हुआ है। उसे देख तनिक चौंके और वह कुछ बोलें इसके पहले ही उनमें से एक आदमी चीखा - "देखते क्या हो कॉमरेड? उतार दो सीने में गोली।" हरिया के हाथों में हरकत हुई; पुलिसवाले का गला रेतकर छीनी हुई 303 राईफल का बैरल रावणेश्वर सिंह की ओर था। उन्होंने प्रत्युत्पन्नमति से काम लिया। नाले की ओर देखा, करीब 10 कदम दूर पूरे वेग से बहता नाला था जिसमें तैर कर निकला जा सकता था; सो धीरे-धीरे अपने पैर पीछे खींचते हुए ध्यान भटकाने के लिए बोले - "हरिया मैंने क्या बिगाड़ा है?"

हरिया चीखा - "तुम साले बड़ी जात वाले हम गरीबों का हक़ मारते हो।"

ठाकुर - "मैंने किसका हक़ मारा? तेरी जान बचाई ,इज्ज़त दी, अपने से अलग न समझा और तू दगाबाजी कर रहा है?"


हरिया को कुछ न सूझा तो बोला - "तुम्हारी जात वाले तो करते हैं न?"

ठाकुर- "तो पूरी दुनिया का ठेका हमने ले रखा है क्या? जिसने किया हो उसे जाकर पकड़....मैं कोई सरकार और पुलिस थोड़े हूँ!"

 हरिया किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा था। इतने दिनों तक जिसने जिलकर रखा था उसे कैसे मार दे पर साथ वाले ने उकसाया - "कॉमरेड गोली चलाओ, सब साले एक जैसे होते हैं!"

हरिया ने राईफल का बोल्ट पकड़ कर खींचा और ठाकुर ने नाले में छलाँग लगा दी। हरिया ने फ़ायर किया पर देर हो गयी, सब दौड़ कर किनारे पहुंचे, दो-तीन फ़ायर और किये पर सब व्यर्थ । 


रावणेश्वर सिंह ने जैसे-तैसे छिपकर रात बिताई। सुबह निकल कर घर गए। भीगे बदन, बिखरे बाल, कीचड़ से सना शरीर और अपमान से आहत झुका सिर। पूरे गाँव में तहलका मच गया। लोग उन्हें जाते देखते रहे पर किसी की हिम्मत न हुई कि कुछ बोले या पूछे। घर जाकर स्नान किया, गाड़ी निकाली और सीधा कोतवाली पहुंचे। सलीम ने बीरबल को बुलाया, मन्त्रणा हुई । बीरबल ने कहा ठाकुर साहब हमें आपका ही इंतजार था। बीहड़ के रास्तों और पहाड़ की स्थितियों से आप लोग वाकिफ़ हैं। फ़ोर्स लेकर हम घुस जाएँ तो जाएँ कहाँ और निकलें कहाँ? 

आप लोग बस गाईड बन जाईये। विश्वास रखिये चूक न होगी। 


चार दिनों बाद पुलिस ने गाँव में डेरा डाल दिया। गाँव छावनी में बदल गया था। छतों पर एलएमजी लग गयीं, क्षेत्र के सारे लाइसेंसी बंदूकधारी इकठ्ठा हुए और संयुक्त अभियान शुरू हुआ। 

तीन महीने के अथक प्रयासों और कई भयँकर मुठभेंड़ो में कई नक्सली नेता और लड़ाके मारे गए। घरों से खींच-खींच कर, निकाल - निकाल, बीहड़ों में दौड़ा-दौड़ा कर मारा गया पर हरिया का कोई पता ही न चला। क्षेत्र में पूर्ण शांति बहाल हो चुकी थी पर लोगों को इस बात का बड़ा आश्चर्य था कि आखिर हरिया का क्या हुआ?


लगभग 8 महीने बीत चुके थे। ठाकुर साहब ने नया ट्रैक्टर खरीदा , मेड इन रशिया, डीटी-२८। फूल-माला से लदे ट्रैक्टर की पूजा हुई, ग्राम देवता राजा लाखन के आगे बलि चढ़ी। ठाकुर साहब स्वयं ट्रैक्टर पर बैठे, खेत में उतारकर हाईड्रोलिक लिफ्ट नीचे की, पूरा क्लच दबाकर पहला गियर लगाते हुए एक्सिलिरेटर बढ़ाकर धीरे से क्लच छोड़ा तो ट्रैक्टर आगे बढ़ा; मेड़ पर खड़े बच्चे उछल-उछल कर ताली बजाते हुए कहते - "गज़ब रज़ा का मशीन है? हाथ भर का कूँड़ काटती है।"


अगले दिन नाले के किनारे हरिया की गोलियों से बिंधी लाश पड़ी थीं। खून मिट्टी से मिल सूखकर काला पड़ चुका था और मुँह पर मक्ख़ियाँ भिनक रहीं थीं। लोग दबी जुबान में चर्चा करते कि "साँप अउर ठाकुर बारह बरिस में आपन बदला ले लेवन की!" 


इस घटना को बीते दो पीढ़ियाँ गुज़र गयी हैं। सोन में बहुत पानी बह चुका है। बीच-बीच में नक्सलियों ने फिर सर उठाया पर बुरी तरह कुचले गए । अब सब कुछ शांत है लेकिन ग्रामीण इलाकों में बड़ी और छोटी जाति की खांंई अबतक नहीं भर पाई है।


- G@urav Singh

26/03/2017

1857 की क्रांति का विश्व पर प्रभाव

सन् ५७ की क्रांति को हुए एक युग बीत चुका है। इस क्रांति के भारत पर तात्कालिक व दूरगामी क्या क्या प्रभाव और परिणाम रहे इसपर तो बहुत से इतिहास कारों ने भलीभाँति प्रकाश डाला है किंतु इस क्रांति का भारत के बाहर; विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा ? या प्रभाव पड़ा भी कि नहीं इससे सामान्य भारतीय जन मानस बहुत सीमा तक अनभिज्ञ है।

विश्व इतिहास में ब्रिटेन, फ़्राँस, अमेरिका और रूस की क्रान्तियाँ सबसे प्रमुख मानी गयी हैं किंतु इनमें और ५७ के स्वातंत्र्य समर में मूलभूत अंतर यह है कि ये क्रान्तियाँ जहाँ स्वदेशी शासकों के अत्याचारों के विरुद्ध सत्ता परिवर्तन के लिये थीं तो भारत की क्रांति एक विदेशी आक्रांता को देश से निकालने के लिए। यह विडम्बना ही है कि कुछ आधुनिक इतिहासवेत्ताओं ने इसे मात्र सैनिक विद्रोह या धार्मिक उन्माद सिद्ध करने का प्रयास किया और जिसके कारण अनेक ऐसे तथ्य व साक्ष्य सामान्य भारतीय जनता तक पहुँचे ही नहीं जो उसे इस क्रांति का वृहद रूप दिखाने व समझाने में सक्षम होते। यदि क्रांति का कारण केवल सैन्य विद्रोह व धार्मिक उन्माद मात्र ही होता तो क्रांति के दमन पश्चात ४ से ४.५ लाख भारत वासियों की निर्ममतापूर्वक हत्यायें न हुई होतीं। दिल्ली से ४० किमी दूर धुलना नामक गाँव में अँग्रेज़ सैनिकों ने सैंकड़ो नागरिकों को मारकर उनके शरीर से चमड़ा उतार उसमें भूसा भरकर पेड़ों पर लटका दिया जिससे भय व्याप्त हो जाए कि विद्रोह का परिणाम क्या हो सकता है! विद्रोह के पश्चात अँग्रेज़ क्रांति से इतने डरे हुए थे कि क्रांति के नेताओं को भारत की जेलों में रखने को तैयार नहीं थे। उन्होंने निश्चित किया कि जिन ब्रिटिश उपनिवेशों में गन्ने, जूट या अन्य फसलों की खेती होती है और वहाँ मजदूरों की आवश्यकता है इन क्रांतिकारी नेताओं को वहाँ भेज दिया जाय किंतु ऑस्ट्रेलिया, जिम्बाब्वे, नाईज़र, चॉड्, दक्षिण अफ़्रीका, मॉरीशस आदि सभी ब्रिटिश उपनिवेशों के भयाक्रांत अँग्रेज़ अधिकारियों ने इन विद्रोहियों को अपने यहाँ रखने से मना कर दिया और अंततः ब्रिटिश सरकार ने इन्हें अंडमान भेजा। जहाँ इन कैदियों ने अपने लिए जेलें भी खुद ही बनाईं। 

द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर द्वारा किये गए यहूदियों के नरसंहार को जितना प्रचार मिला उसका शतांश भी ५७ की क्रांति में बलिदान हुए भारतीयों को नहीं मिला जबकि यह घटना द्वितीय विश्व युद्ध से मात्र ९० वर्ष पुरानी थी। 


सन् ५७ का सबसे अछूता भाग तो यह है कि जहाँ कुछ भारतीय अपने ही देशवासियों के विरुद्ध अँग्रेज़ों के साथ थे तो वहीं कुछ ब्रिटिश और एंग्लो इंडियन अधिकारी व सिपाही भारतीयों के साथ लड़े और बलिदान भी हो गए। सार्जेंट मेजर रॉबर्ट गॉर्डन, ६० किंग्स रॉयल राईफ़ल कोर, ड्रमर विलयम डेडियर, ३ कम्पनी, ६ बंगाल नेटिव इन्फैंट्री, कैप्टन सावेरी, कैप्टन रॉटेन और कुछ अन्य अज्ञात अँग्रेज़ व एंग्लो इंडियन। यहाँ तक कि कुछ फ्रांसीसी और रूसी भी अपने देश से आकर विद्रोहियों के साथ लड़े और मारे गए। 


१८५७ की क्रांति ने केवल भारत या एशिया ही नहीं अपितु समूचे विश्व को आंदोलित कर दिया था। यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के सामान्य जन मानस पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। विश्व के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाली इस महान क्रांति ने इटली में नवजागरण, स्वतंत्रता व एकीकरण की भावना को उद्वेलित कर दिया। मैजिनी ने अपने समाचार पत्र इटालिया-डेल-पोपेलो में भारत व इस क्रांति के ऊपर २३ लेख लिखे। फ्रांस के अखबार ली सीशल के ९ सितम्बर १८५७ के अंक में मुखपृष्ठ पर लिखा था 'भारत में क्रांति ही अकेली बड़ी घटना है जिसपर इस समय पूरे विश्व का ध्यान केंद्रित है।' नाना साहब के वकील अजीमुल्ला खान ने पहले ब्रिटेन फिर इटली व रूस की यात्राएं की और इस क्रांति के लिए विदेशों से समर्थन भी जुटाया वो इटली में गैरीबाल्डी से मिले। गैरीबाल्डी तो भारत की इस क्रांति में भाग लेने के लिए ही चल पड़े किंतु इटली की ही कुछ आंतरिक समस्याओं के कारण भारत न आ सके।

इस क्रांति सबसे सीधा प्रभाव तो स्वयं ब्रिटेन पर पड़ा। जेम्स स्टीफ़ेन नामक आयरिश सिविल इंजीनियर ने आयरलैंड में अंग्रेजों के विरुद्ध १८५८ में ही विद्रोह कर दिया। उसका यह विद्रोह तो १८६७ में ही समाप्त हो गया किंतु इसने स्वतंत्र आयरिश देश की भावना को ऐसी आग लगाई की यह आग २० वीं शताब्दी तक ब्रिटेन को झुलसाती रही। पड़ोसी चीन में १८५० में प्रारंभ हुआ ताइपिंग विद्रोह मृतप्रायः था किंतु ५७ के समर ने मानो चीनीयों को भी नई ऊर्जा दे दी हो और उन्होंने स्वार्गिक शांति का राज्य नामकी संस्था बनाकर चीन में तेजी से फैल रहे ईसाई मशीनरियों की संस्था वर्शिपर ऑफ गॉड व उसके मुखिया शी हुक्वांग जो अपने को जीसस क्राईस्ट का छोटा भाई कहता था; के विरुद्ध शस्त्र उठा लिए और उनका यह संघर्ष १८६४ तक चलता रहा। 


प्रथम व द्वितीय विश्व युद्धों को छोड़ दिया जाए तो भू भाग के विस्तार, क्रांति की प्रकृति व जन-धन की हानि की दृष्टि से १८५७ का विद्रोह आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा विप्लव था। इसने भारत के साथ साथ ही समग्र विश्व की मानव सभ्यता पर एक अमिट छाप छोड़ी। इस संग्राम ने सम्पूर्ण भारत की स्वतंत्रता की भावना का पहली बार निर्माण किया और भविष्य के संघर्ष की नींव रखी यह अपने तत्कालीन उद्देश्य में भले ही असफल हो गयी किंतु यह क्रांति १५ अगस्त १९४७ की मजबूत नींव थी। इस क्रांति में बलिदान होने वाले भारतीयों के अतिरिक्त हमारे श्रद्धा सुमनों की आकांक्षा उन कुछ ज्ञात व अज्ञात विदेशियों को भी है जिन्होंने हमारे पूर्वजों के साथ इस भारत भूमि के लिए अपना रक्त और स्वेद बहाया व बलिदान हो गए। उन सभी हुतात्माओं को नमन!


● गौरव सिंह

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