सन् ५७ की क्रांति को हुए एक युग बीत चुका है। इस क्रांति के भारत पर तात्कालिक व दूरगामी क्या क्या प्रभाव और परिणाम रहे इसपर तो बहुत से इतिहास कारों ने भलीभाँति प्रकाश डाला है किंतु इस क्रांति का भारत के बाहर; विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा ? या प्रभाव पड़ा भी कि नहीं इससे सामान्य भारतीय जन मानस बहुत सीमा तक अनभिज्ञ है।
विश्व इतिहास में ब्रिटेन, फ़्राँस, अमेरिका और रूस की क्रान्तियाँ सबसे प्रमुख मानी गयी हैं किंतु इनमें और ५७ के स्वातंत्र्य समर में मूलभूत अंतर यह है कि ये क्रान्तियाँ जहाँ स्वदेशी शासकों के अत्याचारों के विरुद्ध सत्ता परिवर्तन के लिये थीं तो भारत की क्रांति एक विदेशी आक्रांता को देश से निकालने के लिए। यह विडम्बना ही है कि कुछ आधुनिक इतिहासवेत्ताओं ने इसे मात्र सैनिक विद्रोह या धार्मिक उन्माद सिद्ध करने का प्रयास किया और जिसके कारण अनेक ऐसे तथ्य व साक्ष्य सामान्य भारतीय जनता तक पहुँचे ही नहीं जो उसे इस क्रांति का वृहद रूप दिखाने व समझाने में सक्षम होते। यदि क्रांति का कारण केवल सैन्य विद्रोह व धार्मिक उन्माद मात्र ही होता तो क्रांति के दमन पश्चात ४ से ४.५ लाख भारत वासियों की निर्ममतापूर्वक हत्यायें न हुई होतीं। दिल्ली से ४० किमी दूर धुलना नामक गाँव में अँग्रेज़ सैनिकों ने सैंकड़ो नागरिकों को मारकर उनके शरीर से चमड़ा उतार उसमें भूसा भरकर पेड़ों पर लटका दिया जिससे भय व्याप्त हो जाए कि विद्रोह का परिणाम क्या हो सकता है! विद्रोह के पश्चात अँग्रेज़ क्रांति से इतने डरे हुए थे कि क्रांति के नेताओं को भारत की जेलों में रखने को तैयार नहीं थे। उन्होंने निश्चित किया कि जिन ब्रिटिश उपनिवेशों में गन्ने, जूट या अन्य फसलों की खेती होती है और वहाँ मजदूरों की आवश्यकता है इन क्रांतिकारी नेताओं को वहाँ भेज दिया जाय किंतु ऑस्ट्रेलिया, जिम्बाब्वे, नाईज़र, चॉड्, दक्षिण अफ़्रीका, मॉरीशस आदि सभी ब्रिटिश उपनिवेशों के भयाक्रांत अँग्रेज़ अधिकारियों ने इन विद्रोहियों को अपने यहाँ रखने से मना कर दिया और अंततः ब्रिटिश सरकार ने इन्हें अंडमान भेजा। जहाँ इन कैदियों ने अपने लिए जेलें भी खुद ही बनाईं।
द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर द्वारा किये गए यहूदियों के नरसंहार को जितना प्रचार मिला उसका शतांश भी ५७ की क्रांति में बलिदान हुए भारतीयों को नहीं मिला जबकि यह घटना द्वितीय विश्व युद्ध से मात्र ९० वर्ष पुरानी थी।
सन् ५७ का सबसे अछूता भाग तो यह है कि जहाँ कुछ भारतीय अपने ही देशवासियों के विरुद्ध अँग्रेज़ों के साथ थे तो वहीं कुछ ब्रिटिश और एंग्लो इंडियन अधिकारी व सिपाही भारतीयों के साथ लड़े और बलिदान भी हो गए। सार्जेंट मेजर रॉबर्ट गॉर्डन, ६० किंग्स रॉयल राईफ़ल कोर, ड्रमर विलयम डेडियर, ३ कम्पनी, ६ बंगाल नेटिव इन्फैंट्री, कैप्टन सावेरी, कैप्टन रॉटेन और कुछ अन्य अज्ञात अँग्रेज़ व एंग्लो इंडियन। यहाँ तक कि कुछ फ्रांसीसी और रूसी भी अपने देश से आकर विद्रोहियों के साथ लड़े और मारे गए।
१८५७ की क्रांति ने केवल भारत या एशिया ही नहीं अपितु समूचे विश्व को आंदोलित कर दिया था। यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के सामान्य जन मानस पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। विश्व के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाली इस महान क्रांति ने इटली में नवजागरण, स्वतंत्रता व एकीकरण की भावना को उद्वेलित कर दिया। मैजिनी ने अपने समाचार पत्र इटालिया-डेल-पोपेलो में भारत व इस क्रांति के ऊपर २३ लेख लिखे। फ्रांस के अखबार ली सीशल के ९ सितम्बर १८५७ के अंक में मुखपृष्ठ पर लिखा था 'भारत में क्रांति ही अकेली बड़ी घटना है जिसपर इस समय पूरे विश्व का ध्यान केंद्रित है।' नाना साहब के वकील अजीमुल्ला खान ने पहले ब्रिटेन फिर इटली व रूस की यात्राएं की और इस क्रांति के लिए विदेशों से समर्थन भी जुटाया वो इटली में गैरीबाल्डी से मिले। गैरीबाल्डी तो भारत की इस क्रांति में भाग लेने के लिए ही चल पड़े किंतु इटली की ही कुछ आंतरिक समस्याओं के कारण भारत न आ सके।
इस क्रांति सबसे सीधा प्रभाव तो स्वयं ब्रिटेन पर पड़ा। जेम्स स्टीफ़ेन नामक आयरिश सिविल इंजीनियर ने आयरलैंड में अंग्रेजों के विरुद्ध १८५८ में ही विद्रोह कर दिया। उसका यह विद्रोह तो १८६७ में ही समाप्त हो गया किंतु इसने स्वतंत्र आयरिश देश की भावना को ऐसी आग लगाई की यह आग २० वीं शताब्दी तक ब्रिटेन को झुलसाती रही। पड़ोसी चीन में १८५० में प्रारंभ हुआ ताइपिंग विद्रोह मृतप्रायः था किंतु ५७ के समर ने मानो चीनीयों को भी नई ऊर्जा दे दी हो और उन्होंने स्वार्गिक शांति का राज्य नामकी संस्था बनाकर चीन में तेजी से फैल रहे ईसाई मशीनरियों की संस्था वर्शिपर ऑफ गॉड व उसके मुखिया शी हुक्वांग जो अपने को जीसस क्राईस्ट का छोटा भाई कहता था; के विरुद्ध शस्त्र उठा लिए और उनका यह संघर्ष १८६४ तक चलता रहा।
प्रथम व द्वितीय विश्व युद्धों को छोड़ दिया जाए तो भू भाग के विस्तार, क्रांति की प्रकृति व जन-धन की हानि की दृष्टि से १८५७ का विद्रोह आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा विप्लव था। इसने भारत के साथ साथ ही समग्र विश्व की मानव सभ्यता पर एक अमिट छाप छोड़ी। इस संग्राम ने सम्पूर्ण भारत की स्वतंत्रता की भावना का पहली बार निर्माण किया और भविष्य के संघर्ष की नींव रखी यह अपने तत्कालीन उद्देश्य में भले ही असफल हो गयी किंतु यह क्रांति १५ अगस्त १९४७ की मजबूत नींव थी। इस क्रांति में बलिदान होने वाले भारतीयों के अतिरिक्त हमारे श्रद्धा सुमनों की आकांक्षा उन कुछ ज्ञात व अज्ञात विदेशियों को भी है जिन्होंने हमारे पूर्वजों के साथ इस भारत भूमि के लिए अपना रक्त और स्वेद बहाया व बलिदान हो गए। उन सभी हुतात्माओं को नमन!
● गौरव सिंह
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