शनिवार, 16 जनवरी 2021

स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर

सावरकर जी के विषय में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने खुले मंच से कहा था -

"सावरकर माने तेज,

सावरकर माने त्याग,

सावरकर माने तप, 

सावरकर माने तत्व, 

सावरकर माने तर्क, 

सावरकर माने तारुण्य, 

सावरकर माने तीर, 

सावरकर माने तलवार, 

सावरकर माने तिलमिलाहट,

सावरकर माने सागराप्राणतलमला, 

सावरकर माने तितिक्षा, 

सावरकर माने तीखापन, 

सावरकर माने तिखत।

कैसा बहुरंगी व्यक्तित्व था उनका।"


 २८ मई १८८३ को नासिक में जन्मे सावरकर की माता का ७ वर्ष और पिता का १६ वर्ष की आयु में देहावसान हो गया। बड़े भाई बाबा राव ने उनका पालन पोषण किया। १९०१ में मैट्रिक पास करने के बाद उनका विवाह यमुना बाई से हुआ। विवाह के पश्चात सावरकर पुणे के प्रतिष्ठित फ़र्ग्यूसन कॉलेज से स्नातक कर लॉ की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। वह चाहते तो बैरिस्टर बन अथाह सम्पत्ति अर्जित कर आलीशान जीवन व्यतीत कर सकते थे किंतु माँ भारती के उस यशस्वी पुत्र के जीवन का एकमात्र ध्येय मातृभूमि की सेवा था। बाल्यकाल में मित्र मेला नामक संगठन की स्थापना कर चुके सावरकर ने १९०४ में ब्रिटेन में अभिनव भारत का गठन किया जिसका उद्देश्य ही भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष था। सावरकर १९०५ में बंग भङ्ग आंदोलन में भागीदार बने और इंग्लैंड में ही लाला हरदयाल से मिले जो लंदन में क्रांतिकारियों के गढ़ इंडिया हाउस के संचालक थे। १९०७ में सन् सत्तावन के विद्रोह की स्वर्णजयंती पर उन्होंने इंडिया हाउस में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया। अपने लंदन में रहने के दौरान ही उन्होंने ब्रिटिश लाइब्रेरियों व संस्थानों से खोज खोज कर तथ्य एकत्रित किये और उस पुस्तक की रचना कर डाली जिसे 'क्रांतिकारियों की गीता' कहा गया। मात्र २५ वर्ष की आयु में सन् १९०९ में विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी कालजयी रचना '1857- The Independence war of India'  लिख डाली। वह जानते थे कि ब्रिटिश हुकूमत किसी भी कीमत पर इस किताब को छपने नहीं देगी अतः उन्होंने मूलतः मराठी में लिखी इस किताब की तीन प्रतियां तैयार कीं जिसमें से एक प्रति उन्होंने अपने बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर के पास भारत भेजी, दूसरी प्रति फ्राँस में मैडम भीका जी कामा के पास भेजी जहाँ मैडम कामा और लाला हरदयाल ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया और तीसरी प्रति अपने मित्र डॉक्टर कुटिन्हों के पास। यह किताब छपने से पहले ही प्रतिबंधित हो गयी और भारत के स्वतंत्र होने पर लिखे जाने के ३८ वर्ष पश्चात सार्वजनिक रूप से सामने आई। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इस किताब ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया इसका अंदाज़ा केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि इसी किताब की प्रेरणा से गदर पार्टी की स्थापना हुई, शहीदे आज़म भगत सिंह ने इसे राजाराम शास्त्री की सहायता से छपवाया और साथी क्रांतिकारियों में वितरित कर दिया, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन व रास बिहारी बोस जैसे नेता भी इस किताब से बड़े प्रभावित हुए। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने इस किताब के तमिल संस्करण छपवाए। 


सावरकर का स्वयं का आज़ादी के संघर्ष में क्या योगदान था यह केवल इस प्रसङ्ग से समझ में आ जाता है कि दुर्गादास खन्ना नामक पूर्व क्रांतिकारी जो बाद में कॉंग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद दिए अपने साक्षात्कार में कहा कि जब वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में भर्ती होने गए तब स्वयं भगत सिंह और सुखदेव ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने विनायक दामोदर की रचित 1857 The Independence war of India और विनायक सावरकर की जीवनी 'Life of a Barrister'  पढ़ी है?

१ जुलाई १९०९ को जब मदनलाल धींगरा ने लंदन में कर्ज़न वायली का वध कर अपनी गिरफ्तारी दे क्रांतिकारियों के सरताज़ बन गए तब सावरकर ने उनके समर्थन में लंदन टाईम्स में लेख लिखा। १३ मई १०१० को सावरकर पहली बार गिरफ्तार हुए और ८ जुलाई १९१० को गिरफ़्त से फरार । उनकी दूसरी गिरफ्तारी के बाद २४ दिसम्बर १९१० को उन्हें पहला आजीवन कारावास, ३१ जनवरी १९११ को पुनः आजीवन कारावास, ७ अप्रैल १९११ को कालापानी की कठोर सजा सुनाई गई। ब्रिटिश सरकार ने उनकी सम्पत्तियां जब्त कर लीं, दो-दो आजीवन कारावास और कालापानी का कठोरतम दण्ड दे दिया। सावरकर अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिए गए और वहाँ भी इस सिंह पुरूष ने जेल के अंदर बम बनाने का षड्यंत्र रच दिया। इस रिपोर्ट पर गृह विभाग ने रेज़नॉइल क्रेडॉक नामक अधिकारी भेजा जिसने सावरकर से भेंट के उपरांत अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में लिखा कि सावरकर को अपने किये पर कोई पछतावा नहीं है।


सावरकर के ऊपर अक्सर वामपंथियों और काँग्रेस के नेताओं द्वारा आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने जेल में रहने के दौरान अंग्रेज़ो से क्षमायाचना की और बार-बार माफ़ी माँगी। दरअसल जब लोग यह झूठे आरोप लगाते हैं तो वह यह भूल जाते हैं कि अंडमान जेल का एक Penal Code था जिसका पालन सावरकर और अन्य क्रांतिकारी नेताओं या कार्यकर्ताओं के ऊपर नहीं किया जाता था। सावरकर लॉ के विद्यार्थी रह चुके थे। कानूनी दांवपेंच जानते थे और उनका सदुपयोग करते थे। उनके पत्रों में सारे कैदियों के हितों की बात की गई है एक General Amnesty की माँग करते हैं वो जिसमें बार-बार यह पूछा गया है ब्रिटिश सरकार से की यदि वे सभी राजनैतिक कैदी हैं तो उनके साथ राजनैतिक कैदियों जैसा व्यवहार हो, उन्हें पढ़ने लिखने को अखबार व कागज़ उपलब्ध कराए जाएँ। कोल्हू में जुतने, पत्थर तोड़ने जैसे कार्यों से विरत रखा जाय, परिवार के लोगों से मिलने और उन्हें पत्र लिखने की अनुमति व साधन दिए जाएं जाएँ और यदि सरकार की दृष्टि में सश्रम कारावास के आरोपी सामान्य कैदी हैं तो उन्हें कम से कम उन सामान्य कैदियों को मिलने वाली सुविधाओं को दिया जाय। सावरकर अंडमान जेल में कैदियों के बीच ब्रिटेन से पढ़कर आये जानकार क्रांतिकारी 'बड़ा बाबू' और 'फिरंगी बाबू' के नाम से प्रसिद्ध थे। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि अपना जीवन कैद में गंवाने से अच्छा है कि बाहर निकल स्वातंत्र्य समर में जो आहुति दी जा सके वह दी जाय। और इसके लिए वह सदैव प्रयत्न करते रहे। जेल से रिहाई को लेकर उन्होंने अपने १९१७ के पत्र में लिखा है "If my name constitutes obstacle to the release of other prisoners than you can delete my name and release others and that will give me as much pleasure as my own release would actually give." प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल ने अपनी आत्मकथा 'मेरा बन्दी जीवन' में लिखा है कि मैंने सावरकर जी की सलाह पर याचिका दायर की और मुझे छोड़ दिया गया। मैंने जो पत्र लिखा था ठीक वही पत्र सावरकर बंधुओ ने भी लिखा था किंतु उन्हें रिहाई नहीं मिली। ब्रिटिश सरकार को भय था कि कहीं सावरकर की रिहाई से बॉम्बे प्रेसिडेंसी में सशस्त्र विद्रोह की आग फिर से न जल उठे! सन् १९२० में जब सावरकर के सबसे छोटे भाई नारायण राव गाँधी जी से मिले और उनसे अनुरोध किया कि वह उनके दोनों बड़े भाईयों की मुक्ति के लिए कुछ प्रयत्न करें तो गाँधी जी ने नारायण राव से कहा कि वह अपने भाईयों को दया याचिका डालने को कहें और स्वयं गाँधी जी ने भी सावरकर बन्धुओं की ओर से याचिका डाली की गणेश राव सावरकर और विनायक सावरकर को छोड़ दिया जाय क्योंकि मांटेग्यू चेम्शफ़ोर्ड सुधारों के आने के पश्चात सशस्त्र क्रान्ति की आवश्यकता नहीं रही है और सावरकर बंधु सशस्त्र क्रांति नहीं करेंगे बल्कि काँग्रेस से जुड़ेंगे या अहिंसक आंदोलनों में भाग लेंगे। अंडमान जेल से बाहर आने के बाद सावरकर का स्वास्थ्य गिर चुका था। पेट की बीमारी व अर्थराइटिस के कारण वह शारीरिक रूप से क्रांतिकारी जीवन व्यतीत करने में अक्षम थे उनका शरीर अक्षम था किंतु मष्तिष्क नहीं। सावरकर के घर में दुर्गा भाभी और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों को शरण मिली। जेल से लौटने के बाद क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्त न होने का छद्म दिखावा करते हुए सावरकर ने जहाँ छिपे रूप में क्रांतिकारियों की हर सम्भव सहायता की तो वहीं उन्होंने समाज सुधार के बहुत से कार्य किये। जातिगत छुआछूत व भेदभाव मिटाने के लिए उन्होंने जागरूकता अभियान चलाया और १९३१ में 'पतित पावन मन्दिर' नामक कैफ़े खोला जहाँ सभी जातियों के व्यक्ति साथ बैठकर भोजन व जलपान कर सकते थे। जातिप्रथा के घनघोर विरोधी व अंतरजातीय विवाहों के समर्थक सावरकर ने जेल से ही शुद्धि आंदोलन चलाया जिसमें उन्होंने मजबूरी या किसी प्रताड़ना वश जबरन मुसलमान बनाये गए हिंदुओ को पुनः सनातन धर्म में वापस लिया। महाराष्ट्र की रत्नागिरी जेल में लिखी उनकी हिंदुत्व नामक किताब में जहाँ उन्होंने हिन्दू राष्ट्र की सँकल्पना की है तो उस हिन्दू राष्ट्र में मुसलमानों या अन्य किसी अल्पसंख्यक को दूसरे दर्ज़े का नागरिक नहीं बताया है अपितु उन्हें वो सभी अधिकार देने की बात की है जो एक स्वतंत्र व सम्प्रभुतासम्पन्न देश के नागरिक को प्राप्त होते हैं। सावरकर का हिंदुत्व धर्म से कहीं अलग हटकर सांस्कृतिक व राजनैतिक दर्शन के रूप में था।


स्वतंत्र भारत में सावरकर को गाँधी जी की हत्या के मुकदमे में फँसाया गया। उनकी सम्पत्ति व डिग्री जब्त कर ली गयी। परिवार के सभी पुरूष जेल में डाल दिये गए। उनकी पत्नी यमुना बाई व भाभी येशु बाई को हत्यारों की पत्नी कहकर अपमान और सामाजिक बहिष्कार किया गया। जीवनयापन का कोई साधन नहीं था तब मैडम भीका जी कामा ने पेरिस से पैसे भेजे जिनसे उनका घर चला। पंडित नेहरू सावरकर से इतना चिढ़ते थे कि उन्होंने उनके साथ कभी मंच साझा करना तक उचित न समझा और घोषणा कि की वह अंडमान जेल तुड़वा कर वहाँ अस्पताल बनवाएंगे लेकिन पंडित नेहरू का देहावसान हो गया और उनके बाद जब शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने सावरकर को स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन देनी प्रारम्भ की। गाँधी जी की हत्या के मुकदमे से बरी होकर लौटे सावरकर को १९५९ में पुणे विश्वविद्यालय ने डी० लिट्० की मानद उपाधि से अलंकृत किया। नवम्बर १९६३ में उनकी पत्नी का देहावसान हुआ और सितंबर १९६५ में बीमार पड़े और जब स्थिति ज्यादा गम्भीर हुई तब इस महामानव ने अन्न-जल व औषधि का त्याग कर दिया और २६ फरवरी १९६६ को प्राण त्याग दिए। माँ भारती के इस सपूत की मृत्यु पर न तो महाराष्ट्र सरकार के एक भी मंत्री शोक व्यक्त करने पहुँचे और न तो कोई केंद्र से आया। लोकसभा स्पीकर ने तो सांसदों के सावरकर को श्रद्धांजलि देने के प्रस्ताव को ही ख़ारिज कर दिया। वाई बी चव्हाण जब देश के गृहमंत्री के रूप में अंडमान गए तो उन्होंने सावरकर जिस सेल में बंद थे वहाँ जाना भी उचित नहीं समझा और उनके बाद मोरार जी देसाई भारत के प्रधानमंत्री रहते हुए अंडमान गए तो उन्होंने भी सावरकर को श्रद्धांजलि तक न दी। सावरकर के बारे में गाँधी जी ने यंग इंडिया में एक लेख लिखते हुए उन्हें 'a faithful son of Bharat... brave, clever and frankly, a revolutionary' कहा। उनकी मृत्यु के पश्चात जब स्वर्गीय इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं तो उन्होंने स्वातंत्र्य वीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक के सेक्रेटरी पण्डित बाखले को २० मई १९८० को लिखे पत्र में सावरकर के विषय में लिखा है


“I have received your letter of 8th May 1980. Veer Savarkar’s daring defiance of the British Government has its own importance in the annals of our Freedom movement. I wish success to the plans to celebrate the birth centenary of the remarkable son of India."


सावरकर ने अपनी आत्मकथा में कहा था कि आज के समय में भले ही मेरे विचारों से लोग सहमत न हों किंतु मेरा मत मेरे जाने के वर्षों बाद अवश्य स्वीकार्य होगा। और देखा जाए तो ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी, बड़े कारखानों, वैश्विकरण, मजबूत अर्थव्यवस्था और औद्योगिक क्रान्ति की जो कल्पना उन्होंने की थी आज भारत वहीं अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय विषयों पर वह सदैव स्पष्ट व प्रभावी विदेशनीति के पक्षधर थे, इज़राइल से मित्रता व देश की बाह्य व आन्तरिक शत्रुओं से रक्षा हेतु एक शक्तिशाली व बड़ी सेना की आवश्यकता की उन्होंने सदैव वकालत की। शत्रु दमन के विषय में वह स्पष्टत: कहते थे 'Get inside the enemy camp and beat them black and blue.' और भारत ने १९७१ के युद्ध, सियाचीन के ऑपरेशन मेघदूत, म्यांमार व POK में सर्ज़ीकल स्ट्राईक और बालाकोट में एयरस्ट्राईक करके यही तो किया है।


सावरकर का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वह ऐसे दार्शनिक हैं जिसके दर्शन में तर्कवाद के साथ उपयोगितावाद, सकारात्मकवाद, मानववाद, यथार्थवाद व सार्वभौमिकता का अद्भुत सँगम है। सावरकर एक महान चिंतक, लेखक, वक्ता, दूरदर्शी राजनेता, प्रखर देशभक्त, राष्ट्रवादी, क्रांतिकारियों के नायक और ऐसे कवि हैं जो बन्दी जीवन में कारागार की दीवारों पर नाखूनों से कविता लिखता था। जेलर यातना देने के लिए उस कवि के एकाकी की साथी उन कविताओं पर सफेदी पुतवा देता और सावरकर फिर अपने नाखूनों से कविता लिख देते। जब कालेपानी से छूटे तो रत्नागिरी की आंशिक कैद मिली और फिर जिस जननी जन्मभूमि की स्वतंत्रता हेतु ऐसे कठोरतम दुःख झेले थे उसकी स्वतंत्रता के पश्चात उसकी आँचल की ममतामयी छाँव व घावों पर स्नेहलेप की जगह पुनः मिला भी तो क्या मिला माँ भारती के इस लाल को! प्रथम तो झूठा अभियोग व कारागार, अभियोग से मुक्त होने पर राजनैतिक प्रतिशोध के कारण आंशिक कारगर व मृत्यु के बाद भी अपने ही लोगों से अपमान, घृणा व पक्षपात के कड़वे घूँट। 


माँ भारती के वीर पुत्र स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर को इस कृतज्ञ भारतवासी की सादर श्रद्धांजलि!!



  • गौरव सिंह


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