आज से ठीक 103 साल पहले तुर्कों और जर्मनों ने भारतीय भालों का स्वाद चखा था। 23 सितम्बर 1918 को हुई हाइफा की लड़ाई भारतीयों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस युद्ध में भाग लेने वाले सैनिक और अफ़सर सभी भारतीय थे। ब्रिटिश राज में भारत में तीन तरह की सेनाएँ थीं; ब्रिटिश आर्मी जिसमें अधिकारी और जवान सभी ब्रिटिश होते थे, ब्रिटिश इंडियन आर्मी जिसमें अधिकारी ब्रिटिश और जवान भारतीय होते थे और तीसरी इंडियन स्टेट फोर्सेज़ अर्थात भारतीय रियासतों की सेनाएँ जिसमें अधिकारी व जवान दोनों भारतीय ही होते थे। हाइफा की लड़ाई ऐसी ही रियासतों की तीन रेजिमेंट्स जोधपुर इम्पीरियल सर्विस लैन्सर्स, मैसूर इम्पीरियल सर्विस लैन्सर्स और हैदराबाद इम्पीरियल सर्विस लैन्सर्स ने लड़ी थी।
जोधपुर लैन्सर्स का नाम उनके अदम्य साहस, आदेश के प्रति प्रतिबद्धता और कठोर अनुशासन के कारण 'जो हुकुम' पड़ गया था। जोधपुर लैन्सर्स 1918 में 15 वीं इम्पीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड, पाँचवी कैवलरी डिवीजन, डेजर्ट माउंटेड कोर की कमान में इजिप्ट पहुँची और कायरो में 3 महीने के प्रशिक्षण के बाद जॉर्डन की घाटी में तैनात हुई। फ्राँस में ट्रेंचो के बीच की लड़ाई से ऊब चुके घुड़सवार योद्धा किसी वास्तविक कैवेलरी चार्ज के लिए उतावले हो रहे थे और उन्हें इसका अवसर मिला 14 जुलाई 1918 को अबू तुलुल में। जोधपुर लैन्सर्स की दो स्क्वॉड्रन्स ने मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत की कमान में तुर्कों को बुरी तरह हराया। इस लड़ाई में जोधपुर लैन्सर्स के 6 सवारों को इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट और 7 को डिस्टिंग्विश सर्विस मेडल से सम्मानित किया गया। लेकिन ये केवल राजपूतों की शौर्य की बानगी भर थी।
इजिप्ट एक्सपेडिशनरी फोर्सेज के कमांडर इन चीफ़ फ़ील्ड मार्शल सर एडमण्ड एल्बेनी ने 19 सितम्बर 1918 को फिलिस्तीन और सीरिया पर आक्रमण किया। ब्रिटिश गुप्तचर विभाग को सूचना मिली कि अबू अल बहाई (Abdu’l-Bahá) जो ब्रिटिश समर्थक है उसे तुर्की सेना ने हाइफा में बन्दी बना लिया है और उसे मृत्युदंड देने के आदेश हैं। उसकी रक्षा के लिए हाइफा पर विजय आवश्यक थी और हाइफा के सबसे निकट ब्रिटिश टुकड़ी थी जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लैन्सर्स। इन तीनों रेजिमेंट्स को हाइफा पर आक्रमण के आदेश दिए गए।
समुद्र तट पर बसे हाइफ़ा के पूर्व व पश्चिम में माउंट कैरेमल और घाटी में किशोन नदी के कारण के कारण इसकी रक्षा करना सुलभ था और जर्मन व तुर्की सेनाओं ने बड़ी सुदृढ़ रक्षापँक्ति बनाई थी। हाइफा में प्रवेश करने के लिए माउंट कैरेमल की घाटी से होकर जाना पड़ता यह घाटी अर्थात डिफाइल (Defile) किशोन नदी के कारण और सँकरी थी। और इस घाटी से जाने वाली टुकड़ी पर माउंट कैरेमल की दोनों चोटियों पर स्थित जर्मन और टर्किश मशीनगनों की दोहरी मार किसी भी प्रकार के आक्रमण की सफलता को असम्भव बना रही थी। अतः यह निश्चित हुआ कि मैसूर लैन्सर्स सुबह दस बजे माउंट कैरेमल पर पीछे से आक्रमण कर जर्मन व टर्किश मशीनगन चौकियाँ अपने नियंत्रण में लेगी, उन्हें इस समय शेरवुड रेंजर्स अपनी तोपों से कवर फायर देंगे और 2 बजे जोधपुर लैन्सर्स डिफाइल अर्थात सँकरी घाटी को छोड़ नदी तट के किनारे चलते हुए हाइफा के प्रवेश द्वार पर आक्रमण करेंगे और उनके पीछे मैसूर लैन्सर्स उन्हें लिंकअप करेगी और हैदराबाद लैन्सर्स को आरक्षित बल के रूप में रखा गया।
लेकिन जैसा कि कहते हैं कि "First casualty of any battle is battle plan itself." 23 सितम्बर को जब सुबह 10 बजे मैसूर लैन्सर्स ने कैरेमल माउंट पर पीछे से चढ़ाई शुरू की तो इतनी खड़ी चढ़ाई थी कि उन्हें अपने घोड़े पीछे छोड़ने पड़े, चढ़ाई इतनी कठिन थी कि उन्हें निश्चित समय से अधिक समय लग रहा था, इधर जोधपुर लैन्सर्स जो मैसूर लैन्सर्स के सकेंत की प्रतीक्षा कर रही थी उसे 2 बजे आक्रमण के आदेश थे अतः संकेत न मिलने पर भी मेजर दलपत सिंह ने आक्रमण के निर्णय लिया और अपने घुड़सवारों को लेकर पहले से तय रास्ते के अनुसार किशोन नदी तक पहुँचे, उनके ऊपर 77 एमएम की तोपों और मशीनगनों से भारी गोलाबारी हो रही थी, नदी की रेत दलदली थी और गहराई के कारण घोड़ों की पीठ पर उसे पार करना असंभव था। अब उनके पास एक ही मार्ग था पीछे मुड़कर पुनः सँकरी घाटी से होकर निकलना। निःसन्देह यह कदम आत्मघाती था लेकिन राजपूत मृत्यु के भय से रणभूमि नहीं छोड़ते। डिफाइल के रास्ते से निकलने के लिए आवश्यक था कि उसपर तैनात मशीनगनों चौकियों को पहले निष्क्रिय किया जाय। जोधपुर लैन्सर्स के वापस मुड़कर डिफाइल तक आने के क्रम में ही मेजर दलपत सिंह मशीनगन की गोलियों के शिकार हो गए। गोलियाँ उन्हें रीढ़ की हड्डी में लगी थीं। कैप्टन ठाकुर अमन सिंह जोधा जो जोधपुर लैन्सर्स की सबसे अनुभवी और पुराने जोधा राठौर सवारों की बी स्क्वॉड्रन कमान कर रहे थे उन्होंने रेजिमेंट की कमान सम्हाली और डिफाइल पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में लिया, डिफाइल के अधिकार में आते ही डी स्क्वॉड्रन कमान कर रहे कैप्टन ठाकुर अनूप सिंह ने अपने सवारों के साथ डिफाइल से आगे बढ़कर माउंट कैरेमल पर पूर्व की ओर से आक्रमण कर वहाँ की मशीनगन चौकियों को निष्क्रिय करते हुए 30 शत्रु सैनिकों को अपने भालों से मार गिराया। शत्रु की शेष मशीनगन चौकियाँ अबतक मैसूर लैन्सर्स के भालों का शिकार हो चुकी थीं। अब कैप्टन अनूप सिंह और कैप्टन अमन सिंह ने अपनी दोनों स्क्वॉड्रन्स को सीधा हाइफा की ओर मोड़ दिया, कमांडिंग ऑफिसर मेजर दलपत सिंह को गोली लगने का समाचार फैल चुका था और सवारों के क्रोध की सीमा नहीं थी। ठीक सामने से आती जर्मन और टर्किश मशीनगनों की गोलियों की बौछार भी उन्हें नहीं रोक सकी, अपने युद्ध घोष रणबाँका राठौर ('The Rathore - Invincible in Battle') की गर्जना करते हुए अपने भालों की नोंक आगे किये ऐसे आक्रमण किया मानो बिजली गिर पड़ी हो। उनके हाइफा तक पहुँचते पहुँचते मैसूर लैन्सर्स भी माउंट कैरेमल से जर्मनों और तुर्कों को मारकर नीचे उतर जोधपुर लैन्सर्स से आ मिले। यह संयुक्त आक्रमण इतना त्वरित, घातक और अकल्पनीय था कि शत्रुओं को पूरी तरह सम्हलने के अवसर भी नहीं मिला, तुर्कों और जर्मनों की लाशें भालों से बिंधी, घोड़ों की टापों से कुचली हुई हाइफा की सड़कों पर पड़ी हुई थीं। इस युद्ध में मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत को मरणोपरांत व कैप्टन ठाकुर अनूप सिंह और सेकेंड लेफ्टिनेंट सगत सिंह को मिलिट्री क्रॉस, कैप्टन अमन सिंह और दफादार जोर सिंह को इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया।
जोधपुर लैन्सर्स और उसके कमान अधिकारी मेजर दलपत सिंह शेखावत के सम्मान में फील्ड मार्शल सर एडमण्ड एल्बेनी ने लिखा
"Whilst the Mysore Lancers were clearing the rocky slopes of Mount Carmel, theJodhpur Lancers charged through the defile, and riding over the enemy's machine guns, galloped into the town, where a number of Turks were speared inthe streets. Maj. Thakur Dalpat Singh, M.C., fell gallantly leading the charge."1,350 enemy prisoners were taken, including 2 German and 35 Ottoman officers. The Jodhpur and Mysore Lancers combined lost 1 officer, 7 soldiers and 60 horses. 6 officers and 28 soldiers were wounded, as were 83 horses.“No more remarkable cavalry action of its scale was fought in the whole course of the campaign. Machine gun bullets over and over again failed to stop the galloping horses even though many of them succumbed afterwards to their injuries.."
The Official History of the War (Military Operations Egypt and Palestine: VolumeII)
एक अन्य ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर कर्नल हार्वी ने ने दलपत सिंह के लिए लिखा
"His death is a loss not only to all Jodhpuris, but to India and the whole of the `British Empire'. The British Government eulogised his heroic deed and adored him as Hero of Haifa."
प्रथम विश्वयुद्ध जहाँ आधुनिक शस्त्रों से लड़ा जा रहा था, शत्रु मशीनगनों और तोपों से सज्जित था और विधिवत युद्ध के लिए तत्पर था वहाँ जोधपुर लैन्सर्स का घोड़ो पर सवार हो केवल अपने भालों के दम पर सीधा आक्रमण कर अपने से सँख्या व बल में अत्यधिक शत्रु को बुरी तरह रौंद देना भारतीय सैनिकों के साहस और वीरता का एक नया प्रतिमान था। आधुनिक युद्ध में यह अंतिम घुड़सवार आक्रमण था जो अपने से संख्या, शस्त्र व बल में अधिक शत्रु के ऊपर सफल हुआ।
स्वतंत्रता के पश्चात सभी स्टेट फोर्सेज़ का भारतीय सेना में विलय हो गया और सन 1953 में जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लैन्सर्स तीनों रेजिमेंट्स को एक में मिलाकर नई रेजिमेंट बनाई गई 61 कैवेलरी। 61 कैवेलरी का प्रतीक चिन्ह मैसूर लैन्सर्स के प्रतीक चिन्ह से लिया गया। 23 सितम्बर को प्रतिवर्ष भारतीय सेना हाइफा दिवस के रूप में मनाती है। दिल्ली का त्रिमूर्ति चौक, मैसूर लैन्सर्स मेमोरियल, बंगलौर, इम्पीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड मेमोरियल, दिल्ली और हाइफा मेमोरियल, इजराइल; इस युद्ध में बलिदान हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि व स्मरण स्वरूप बनाये गए हैं।
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