शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

कामरेड

तब सोनभद्र मिर्ज़ापुर से बंटकर अस्तित्व में न आया था और सारे सरकारी काम मिर्ज़ापुर से ही संचालित होते थे। सुदूर दक्षिणांचल में घाट उतरकर सोन नदी के पार रेण और बिजुर नाम की पहाड़ी नदियों से घिरे जंगलो में बसे इलाके में एक गाँव था राजापुर ।

ठाकुर रावणेश्वर सिंह गाँव क्या; पूरे इलाके के जाने-माने आदमी थे। नाम के अनुरूप काया थी, अच्छा-खासा साढ़े छः फुट का कसरती शरीर, भरा हुआ चेहरा, गौरवर्ण, बिल्लौरी आँखे और रौबीली मूँछे। बल भी अथाह था, नागपंचमी के दिन अखाड़े में उतर जब ताल ठोंकते तो मजाल की कोई पहलवान टिक जाये! कुड़ारी में माँ दुर्गा के मंदिर में बलि दी जाती थी नवरात्रि पर और रावणेश्वर सिंह एक हाथ में भैंसे का सिर अलग कर देते थे।

ठाकुर साहब क्षेत्र के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनके पास बुलेट मोटरसाईकिल और फ़ोर्ड की जीप हुआ करती थी। पर हर तरह से साधन सम्पन्न होने के बाद भी अहं उनको छू भी न पाया था और यही वजह थी कि क्षेत्र में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी ।

हरिया मल्लाह उनका ख़ास आसामी था। सोन की बाढ़ ने उसका सबकुछ छीन वृद्धा माँ, पत्नी और कन्या लौटा दिए थे। ठाकुर ने हरिया को आश्रय और सम्मान दिया तो वह भी जहाँ उनका पसीना गिरे वहाँ अपना खून गिराने को तैयार रहता। 


तब दरवाजे पर ट्रैक्टर खड़ा होना सम्पन्नता और बड़े आदमियत की निशानी मानी जाती थी। लोग रशियन डीटी - २८ और मेड इन इंग्लैंड इंटरनेशनल को दरवाजे पर खड़ा कर बाँह फुलाते थे फिर जिसके पास फ़ोर्ड था वह तो हल-बैल वालों को जरा भी न पतियाता। लेकिन इसके बाद भी ठाकुर साहब के खेत बैलों के माथे थे। जब - तब वो असामियों से चुहल करते - "काs..हो जीतन..s.., ए हरिया; सोच रहे हैं हमहूँ एक ठो डीटी -२८ मँगवा लें, गज़ब मशीन है रजा ! हाथ भर का कूँड़ काटती है महराज; जोतनी-बोवनी का टाईम 20 दिन घटा दे।"

और इतना सुनते ही जीतन और हरिया की नानी मर जातीं, चीख मारकर कहते "सरकार हमहीं लोग आप के 'टेक्टर' हैं; कल से चार हल और बढ़ जायेगा।"

ठाकुर सुनते और ठठाकर हँसते हुए कहते "ठीक है भाई, जाओ नहीं आएगा ट्रैक्टर।"


हरिया की लड़की कि शादी थी। बारात ठाकुर साहब के बगीचे में रुकी, बारातियों ने इतनी गज़ब की व्यवस्था कहीं न देखी थी। खान-पान, आवभगत और सुविधा की बड़ाई आपस में ही गाते न थकते थे कि गज़ब हुआ, द्वारपूजा के समय रावणेश्वर सिंह ने अपनी राईफल से 11 फ़ायर किये और वर-कन्या के पाँव छू १०१ रुपये कुर्ते से निकाल रख दिए। लोग बाग दंग थे कि इतना बड़ा आदमी और ये सद्भाव! हरिया तो पैरों में ही लोट जाता अगर वह बिगड़ कर न कहते "अरे खड़े रहो चुपचाप; वर-कन्या साक्षात् विष्णु और लक्ष्मी का रूप होते हैं! सब पुन्य तुम अकेलहीं खाओगे क्या ...?"


पहली बार ऐसा था जब लोगों को रावणेश्वर सिंह के बजाय हरिया से ईर्ष्या हुई। बड़ी-छोटी हर जाति का आदमी कहता - फिरता "केवल कहने भर को ससुरा मल्लाह है; वरना बाऊ साहब तो पूरा कपार पर चढ़ा रखे हैं। एक पंडित जी बोले - "कहीं एक दिन अपनी थाली में भात खिलाकर यह न कह दें कि हरिया आज से तुम ठाकुर हो। ठाकुर हरिनारायण सिंह चंदेल।" एक दूसरे ठाकुर ने बात काटी और बोला - "ऐसा करेंगे तो जाति से बाहर न हो जाएँगे!" पंडित जी बोले - "कौन करेगा जाति से बाहर ? राजा साहब बड़हर से कितनी बनती है उनकी!" 

इसी तरह की तमाम कुढ़ने वाली निर्रथक चर्चाएँ नित्य होकर समाप्त हो जातीं और लोग निंदा कर अपने मन का गुबार शांत कर लेते।


२-३ साल बाद की बात है, क्षेत्र में लाल सलाम कि सुगबुगाहट होने लगी थी। कम्युनिज्म यानी साम्यवाद का लाल दानव सबकुछ निगलने को तैयार होने लगा था। जहाँ-तहाँ लाल झंडे और पर्चे दिख जाते। बीहड़ों में चरवाहों और सूने रास्तों पर राहगीरों को अक्सर मुँह बाँधे हथियार बन्द लोग मिल जाते, जो दावा करते थे खुद के उनका मसीहा होने का और अमीरी-गरीबी की खांई पाटने का। 

दो-चार छिटपुट घटनाएँ भी हुईं पर सबकुछ शांत ही रहा शुरू में, लेकिन एक दिन एक पुलिसवाले ने एक मल्लाह लड़की को पकड़ा, पर खेतों में काम कर रहे लोगों की सजगता से वह बालिका बच गयी। पुलिसवाले को मार-पीट भगाने के बाद लोग बालिका के माँ-बाप समेत ठाकुर साहब के पास पहुँचे। चूंकि साँझ ढल आई थी इसलिए उन्होंने अगले दिन कोतवाली जाने की जिम्मेदारी स्वयं पर लेकर उन्हें वापस लौटाया और सोये तो सुबह खबर मिली कि उस थानेदार की गला रेतकर हत्या हो चुकी है और बाकी पुलिसवाले थाने में नंगा कर बाँध कर पीटे गए हैं। लोगों का एक बड़ा वर्ग इस त्वरित न्याय से बड़ा प्रभावित हुआ; पर आने वाले विप्लव का अनुमान किसी को न था । 


शाम होते-होते डीएसपी और नगर कोतवाल अपने दल-बल के साथ गाँव पहुंचे, जम कर दारू-मुर्गा काटा, थोड़ा जंगलो की सैर की और लौट गए पर चिंगारी अब भड़क चुकी थी । 

नित्य नई घटनाएँ होतीं । कई बार पुलिसवाले मारे गए, सवर्णों की हत्यायें शुरू हो गयीं । जहाँ-तहाँ लाल झंडे दिख जाते तो कहीं गाँवो में पोस्टर। लोगों में लाल सलाम का नाम और डर सर चढ़ कर बोल रहा था। सवर्णों के मन में भी दिन पर दिन कटुता बढ़ी ही जाती थी अन्य जातियों के लिए।

स्थितियाँ हाथ से निकलती देख प्रशासन ने नगर कोतवाल और डीएसपी का तबादला कर दो नए अधिकारी भेजे; मुहम्मद सलीम और बीरबल पाण्डेय। दोनों पूरे राहु-केतु थे, चित्रकूट के बीहड़ों का कोई ऐसा गिरोह न था जो पानी न माँग गया हो ये दो नाम सुनकर। जाने कितने दस्यु सरगना इनकी बंदूक से निकला बारूद चाट मीठी नींद सोये थे। 

दोनों ने आते ही पूरा इलाका छान मारा। गाँव-जवार की खबर ली, मुखबिर छोड़े और पुरानी घटनाओं की पड़ताल कर तथ्य निकाले तो खुद काँप उठे। डकैतों का अलग गिरोह होता है; उनमें परस्पर शत्रुता होती है, आप कुछ न कर पा रहे हों तो उन्हें आपस में लड़ा दीजिये। जब खुद लड़कर मर जाएँ तो बचे-खुचों को आप समाप्त कर दीजिये। किन्तु यहाँ तो पूरा संगठन खड़ा था नक्सलियों का। जो पोषित था तन, मन, धन से, और इसकी जड़ें कहाँ थीं किसे पता ..?


बीरबल और सलीम ने मन्त्रणा की, इतने कच्चे खिलाड़ी न थे अतः सामना करने का निश्चय किया और बिना बाहरी दिखावे के अंदर ही अंदर सेंधमारी का काम शुरू कर दिया। 


एक दिन ऐसे ही मुखबिर ने कुछ सूचना दी और दोनों रावणेश्वर सिंह के घर पहुँचे। भेंट हुई, चाय-नाश्ते का दौर चला, दुनिया - जहान की बातों में ही हरिया दिखा तो उसकी भी पूरी कहानी ठाकुर ने उन्हें बता दी। अब तक शाम हो आई थी, दोनों ने वापसी की तैयारी की तो ठाकुर ने रात्रि भोजन तक रुकने का आग्रह किया। दोनों रुक गए, गाँव में घूमे, दो-चार आदमियों से बातें कि, शक और पुख़्ता हुआ। 

भोजनोपरांत जब दोनों चलने लगे तो बीरबल ने ठाकुर से कहा, "बाबू साहब इलाके के हर सवर्ण और धनी आदमी पर हमला हुआ या लेवी ली गयी; आप कैसे बच गए? सावधान रहिएगा!"


बीरबल और सलीम तो ताक़ीद कर लौट आये पर ठाकुर साहब ने उनकी बातों को यूँ ही हवा में उड़ा दिया। अगले दिन रात्रि भोजन के बाद ठाकुर साहब बगीचे की ओर निकल गए। अँजोरिया रात थी, घूमफिर कर करीब घण्टे भर बाद लौट रहे थे। सावन का महीना था और सोन पूरे उफ़ान पर थी जिसकी वजह से नाले भी चढ़े हुए थे। ठाकुर गाँव के दक्षिण वाले नाले के करार पर से हाथ में टार्च और लाठी लिए अलमस्त स्वर में आल्हा का मनपसन्द छंद "... जिस दिन आल्हा जनम लियो, धरती धँसी अढ़ाई हाथ....." गाते हुए लौट रहे थे कि लगा पास वाली बँसखार के पीछे कोई है। दहाड़कर बोले कौन है और चार कदम आगे बढ़ टॉर्च की रोशनी मारी तो देखा हरिया 4-5 लोगों के साथ बैठा हुआ है। उसे देख तनिक चौंके और वह कुछ बोलें इसके पहले ही उनमें से एक आदमी चीखा - "देखते क्या हो कॉमरेड? उतार दो सीने में गोली।" हरिया के हाथों में हरकत हुई; पुलिसवाले का गला रेतकर छीनी हुई 303 राईफल का बैरल रावणेश्वर सिंह की ओर था। उन्होंने प्रत्युत्पन्नमति से काम लिया। नाले की ओर देखा, करीब 10 कदम दूर पूरे वेग से बहता नाला था जिसमें तैर कर निकला जा सकता था; सो धीरे-धीरे अपने पैर पीछे खींचते हुए ध्यान भटकाने के लिए बोले - "हरिया मैंने क्या बिगाड़ा है?"

हरिया चीखा - "तुम साले बड़ी जात वाले हम गरीबों का हक़ मारते हो।"

ठाकुर - "मैंने किसका हक़ मारा? तेरी जान बचाई ,इज्ज़त दी, अपने से अलग न समझा और तू दगाबाजी कर रहा है?"


हरिया को कुछ न सूझा तो बोला - "तुम्हारी जात वाले तो करते हैं न?"

ठाकुर- "तो पूरी दुनिया का ठेका हमने ले रखा है क्या? जिसने किया हो उसे जाकर पकड़....मैं कोई सरकार और पुलिस थोड़े हूँ!"

 हरिया किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा था। इतने दिनों तक जिसने जिलकर रखा था उसे कैसे मार दे पर साथ वाले ने उकसाया - "कॉमरेड गोली चलाओ, सब साले एक जैसे होते हैं!"

हरिया ने राईफल का बोल्ट पकड़ कर खींचा और ठाकुर ने नाले में छलाँग लगा दी। हरिया ने फ़ायर किया पर देर हो गयी, सब दौड़ कर किनारे पहुंचे, दो-तीन फ़ायर और किये पर सब व्यर्थ । 


रावणेश्वर सिंह ने जैसे-तैसे छिपकर रात बिताई। सुबह निकल कर घर गए। भीगे बदन, बिखरे बाल, कीचड़ से सना शरीर और अपमान से आहत झुका सिर। पूरे गाँव में तहलका मच गया। लोग उन्हें जाते देखते रहे पर किसी की हिम्मत न हुई कि कुछ बोले या पूछे। घर जाकर स्नान किया, गाड़ी निकाली और सीधा कोतवाली पहुंचे। सलीम ने बीरबल को बुलाया, मन्त्रणा हुई । बीरबल ने कहा ठाकुर साहब हमें आपका ही इंतजार था। बीहड़ के रास्तों और पहाड़ की स्थितियों से आप लोग वाकिफ़ हैं। फ़ोर्स लेकर हम घुस जाएँ तो जाएँ कहाँ और निकलें कहाँ? 

आप लोग बस गाईड बन जाईये। विश्वास रखिये चूक न होगी। 


चार दिनों बाद पुलिस ने गाँव में डेरा डाल दिया। गाँव छावनी में बदल गया था। छतों पर एलएमजी लग गयीं, क्षेत्र के सारे लाइसेंसी बंदूकधारी इकठ्ठा हुए और संयुक्त अभियान शुरू हुआ। 

तीन महीने के अथक प्रयासों और कई भयँकर मुठभेंड़ो में कई नक्सली नेता और लड़ाके मारे गए। घरों से खींच-खींच कर, निकाल - निकाल, बीहड़ों में दौड़ा-दौड़ा कर मारा गया पर हरिया का कोई पता ही न चला। क्षेत्र में पूर्ण शांति बहाल हो चुकी थी पर लोगों को इस बात का बड़ा आश्चर्य था कि आखिर हरिया का क्या हुआ?


लगभग 8 महीने बीत चुके थे। ठाकुर साहब ने नया ट्रैक्टर खरीदा , मेड इन रशिया, डीटी-२८। फूल-माला से लदे ट्रैक्टर की पूजा हुई, ग्राम देवता राजा लाखन के आगे बलि चढ़ी। ठाकुर साहब स्वयं ट्रैक्टर पर बैठे, खेत में उतारकर हाईड्रोलिक लिफ्ट नीचे की, पूरा क्लच दबाकर पहला गियर लगाते हुए एक्सिलिरेटर बढ़ाकर धीरे से क्लच छोड़ा तो ट्रैक्टर आगे बढ़ा; मेड़ पर खड़े बच्चे उछल-उछल कर ताली बजाते हुए कहते - "गज़ब रज़ा का मशीन है? हाथ भर का कूँड़ काटती है।"


अगले दिन नाले के किनारे हरिया की गोलियों से बिंधी लाश पड़ी थीं। खून मिट्टी से मिल सूखकर काला पड़ चुका था और मुँह पर मक्ख़ियाँ भिनक रहीं थीं। लोग दबी जुबान में चर्चा करते कि "साँप अउर ठाकुर बारह बरिस में आपन बदला ले लेवन की!" 


इस घटना को बीते दो पीढ़ियाँ गुज़र गयी हैं। सोन में बहुत पानी बह चुका है। बीच-बीच में नक्सलियों ने फिर सर उठाया पर बुरी तरह कुचले गए । अब सब कुछ शांत है लेकिन ग्रामीण इलाकों में बड़ी और छोटी जाति की खांंई अबतक नहीं भर पाई है।


- G@urav Singh

26/03/2017

1857 की क्रांति का विश्व पर प्रभाव

सन् ५७ की क्रांति को हुए एक युग बीत चुका है। इस क्रांति के भारत पर तात्कालिक व दूरगामी क्या क्या प्रभाव और परिणाम रहे इसपर तो बहुत से इतिहास कारों ने भलीभाँति प्रकाश डाला है किंतु इस क्रांति का भारत के बाहर; विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा ? या प्रभाव पड़ा भी कि नहीं इससे सामान्य भारतीय जन मानस बहुत सीमा तक अनभिज्ञ है।

विश्व इतिहास में ब्रिटेन, फ़्राँस, अमेरिका और रूस की क्रान्तियाँ सबसे प्रमुख मानी गयी हैं किंतु इनमें और ५७ के स्वातंत्र्य समर में मूलभूत अंतर यह है कि ये क्रान्तियाँ जहाँ स्वदेशी शासकों के अत्याचारों के विरुद्ध सत्ता परिवर्तन के लिये थीं तो भारत की क्रांति एक विदेशी आक्रांता को देश से निकालने के लिए। यह विडम्बना ही है कि कुछ आधुनिक इतिहासवेत्ताओं ने इसे मात्र सैनिक विद्रोह या धार्मिक उन्माद सिद्ध करने का प्रयास किया और जिसके कारण अनेक ऐसे तथ्य व साक्ष्य सामान्य भारतीय जनता तक पहुँचे ही नहीं जो उसे इस क्रांति का वृहद रूप दिखाने व समझाने में सक्षम होते। यदि क्रांति का कारण केवल सैन्य विद्रोह व धार्मिक उन्माद मात्र ही होता तो क्रांति के दमन पश्चात ४ से ४.५ लाख भारत वासियों की निर्ममतापूर्वक हत्यायें न हुई होतीं। दिल्ली से ४० किमी दूर धुलना नामक गाँव में अँग्रेज़ सैनिकों ने सैंकड़ो नागरिकों को मारकर उनके शरीर से चमड़ा उतार उसमें भूसा भरकर पेड़ों पर लटका दिया जिससे भय व्याप्त हो जाए कि विद्रोह का परिणाम क्या हो सकता है! विद्रोह के पश्चात अँग्रेज़ क्रांति से इतने डरे हुए थे कि क्रांति के नेताओं को भारत की जेलों में रखने को तैयार नहीं थे। उन्होंने निश्चित किया कि जिन ब्रिटिश उपनिवेशों में गन्ने, जूट या अन्य फसलों की खेती होती है और वहाँ मजदूरों की आवश्यकता है इन क्रांतिकारी नेताओं को वहाँ भेज दिया जाय किंतु ऑस्ट्रेलिया, जिम्बाब्वे, नाईज़र, चॉड्, दक्षिण अफ़्रीका, मॉरीशस आदि सभी ब्रिटिश उपनिवेशों के भयाक्रांत अँग्रेज़ अधिकारियों ने इन विद्रोहियों को अपने यहाँ रखने से मना कर दिया और अंततः ब्रिटिश सरकार ने इन्हें अंडमान भेजा। जहाँ इन कैदियों ने अपने लिए जेलें भी खुद ही बनाईं। 

द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर द्वारा किये गए यहूदियों के नरसंहार को जितना प्रचार मिला उसका शतांश भी ५७ की क्रांति में बलिदान हुए भारतीयों को नहीं मिला जबकि यह घटना द्वितीय विश्व युद्ध से मात्र ९० वर्ष पुरानी थी। 


सन् ५७ का सबसे अछूता भाग तो यह है कि जहाँ कुछ भारतीय अपने ही देशवासियों के विरुद्ध अँग्रेज़ों के साथ थे तो वहीं कुछ ब्रिटिश और एंग्लो इंडियन अधिकारी व सिपाही भारतीयों के साथ लड़े और बलिदान भी हो गए। सार्जेंट मेजर रॉबर्ट गॉर्डन, ६० किंग्स रॉयल राईफ़ल कोर, ड्रमर विलयम डेडियर, ३ कम्पनी, ६ बंगाल नेटिव इन्फैंट्री, कैप्टन सावेरी, कैप्टन रॉटेन और कुछ अन्य अज्ञात अँग्रेज़ व एंग्लो इंडियन। यहाँ तक कि कुछ फ्रांसीसी और रूसी भी अपने देश से आकर विद्रोहियों के साथ लड़े और मारे गए। 


१८५७ की क्रांति ने केवल भारत या एशिया ही नहीं अपितु समूचे विश्व को आंदोलित कर दिया था। यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के सामान्य जन मानस पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। विश्व के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाली इस महान क्रांति ने इटली में नवजागरण, स्वतंत्रता व एकीकरण की भावना को उद्वेलित कर दिया। मैजिनी ने अपने समाचार पत्र इटालिया-डेल-पोपेलो में भारत व इस क्रांति के ऊपर २३ लेख लिखे। फ्रांस के अखबार ली सीशल के ९ सितम्बर १८५७ के अंक में मुखपृष्ठ पर लिखा था 'भारत में क्रांति ही अकेली बड़ी घटना है जिसपर इस समय पूरे विश्व का ध्यान केंद्रित है।' नाना साहब के वकील अजीमुल्ला खान ने पहले ब्रिटेन फिर इटली व रूस की यात्राएं की और इस क्रांति के लिए विदेशों से समर्थन भी जुटाया वो इटली में गैरीबाल्डी से मिले। गैरीबाल्डी तो भारत की इस क्रांति में भाग लेने के लिए ही चल पड़े किंतु इटली की ही कुछ आंतरिक समस्याओं के कारण भारत न आ सके।

इस क्रांति सबसे सीधा प्रभाव तो स्वयं ब्रिटेन पर पड़ा। जेम्स स्टीफ़ेन नामक आयरिश सिविल इंजीनियर ने आयरलैंड में अंग्रेजों के विरुद्ध १८५८ में ही विद्रोह कर दिया। उसका यह विद्रोह तो १८६७ में ही समाप्त हो गया किंतु इसने स्वतंत्र आयरिश देश की भावना को ऐसी आग लगाई की यह आग २० वीं शताब्दी तक ब्रिटेन को झुलसाती रही। पड़ोसी चीन में १८५० में प्रारंभ हुआ ताइपिंग विद्रोह मृतप्रायः था किंतु ५७ के समर ने मानो चीनीयों को भी नई ऊर्जा दे दी हो और उन्होंने स्वार्गिक शांति का राज्य नामकी संस्था बनाकर चीन में तेजी से फैल रहे ईसाई मशीनरियों की संस्था वर्शिपर ऑफ गॉड व उसके मुखिया शी हुक्वांग जो अपने को जीसस क्राईस्ट का छोटा भाई कहता था; के विरुद्ध शस्त्र उठा लिए और उनका यह संघर्ष १८६४ तक चलता रहा। 


प्रथम व द्वितीय विश्व युद्धों को छोड़ दिया जाए तो भू भाग के विस्तार, क्रांति की प्रकृति व जन-धन की हानि की दृष्टि से १८५७ का विद्रोह आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा विप्लव था। इसने भारत के साथ साथ ही समग्र विश्व की मानव सभ्यता पर एक अमिट छाप छोड़ी। इस संग्राम ने सम्पूर्ण भारत की स्वतंत्रता की भावना का पहली बार निर्माण किया और भविष्य के संघर्ष की नींव रखी यह अपने तत्कालीन उद्देश्य में भले ही असफल हो गयी किंतु यह क्रांति १५ अगस्त १९४७ की मजबूत नींव थी। इस क्रांति में बलिदान होने वाले भारतीयों के अतिरिक्त हमारे श्रद्धा सुमनों की आकांक्षा उन कुछ ज्ञात व अज्ञात विदेशियों को भी है जिन्होंने हमारे पूर्वजों के साथ इस भारत भूमि के लिए अपना रक्त और स्वेद बहाया व बलिदान हो गए। उन सभी हुतात्माओं को नमन!


● गौरव सिंह

अभ्युत्थानम्

उपन्यास सरस ललित गद्य वृहत्कथाओं का साहित्य प्रेमियों द्वारा रसास्वादन करने का एक मात्र साधन है। अब ये सरस ललित वृहद गद्यकथाएँ काल्पनिक हैं ...