उपन्यास सरस ललित गद्य वृहत्कथाओं का साहित्य प्रेमियों द्वारा रसास्वादन करने का एक मात्र साधन है। अब ये सरस ललित वृहद गद्यकथाएँ काल्पनिक हैं या वर्तमान अथवा भूत की किसी वास्तविक घटना, व्यक्ति, युग पर आधारित हैं इसका एकमेव अधिकार लेखक के पास सुरक्षित होता है और इसी के आधार पर उपन्यासों के भिन्न प्रकार हैं जिनमें से एक प्रमुख है ऐतिहासिक उपन्यास। साहित्यप्रेमी होने के नाते हमने भी पूर्व में ऐतिहासिक उपन्यास पढ़ रखे थे जो कि हिंदी के श्रेष्ठतम लेखकों की कृतियाँ थीं किंतु बड़े भाई अजीत भईया पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिनसे हम पूर्वपरिचित हैं और इनकी प्रथम प्रकाशित रचना 'अभ्युत्थानम्' जो की एक ऐतिहासिक उपन्यास है; के 'रसास्वादन' का हमें सौभाग्य प्राप्त हुआ। किसी भी रचना की सटीक आलोचना, समालोचना या फिर समीक्षा करना सामान्य साहित्यप्रेमी अथवा पाठक के वश में नहीं होता, वह तो केवल अपनी रुचि - अरुचि व्यक्त कर सकता है। अतः पुस्तक समीक्षा का गुरुतर कार्य विद्वतजनों, व्याकरण व भाषा विशारदों के ऊपर छोड़कर हम एक सामान्य पाठक के रूप में अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं।
ऐतिहासिक उपन्यास होने के लिए सर्वाधिक आवश्यक होता है उसकी कथा का प्रख्यात् होना, पाठकों का उससे किसी न किसी प्रकार से पूर्व-परिचित होना। भला आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य के नाम से कौन अपरिचित होगा। उपन्यास का आरंभ दुश्चरित्र नन्द द्वारा मगध के सिंहासन की प्राप्ति हेतु किये जा रहे षड्यंत्रों से होता है और उसके राजा बनने, अपनी प्रजा व अपने विरोधियों के ऊपर किये गए दुराचारों से होता हुआ, चाणक्य व चन्द्रगुप्त के उदय, सिकन्दर के भारत पर आक्रमण, उसकी जय-पराजय व उसमें चाणक्य व चन्द्रगुप्त के योगदान, सिकन्दर से युद्ध में विभिन्न जनपदों के विघटन व विनाश से होकर अंतत: सभी के एकसूत्र में जुड़कर चन्द्रगुप्त के भारत के सम्राट बनने और उसके द्वारा सेल्यूकस की पराजय पर समाप्त होता है।
ऐतिहासिक उपन्यास का दूसरा महत्वपूर्ण तत्त्व है उस देशकाल का वास्तविक किंतु आकर्षक चित्रण जिसमें पुस्तक पूर्ण रूप से खरी उतरी है। पात्रों के वर्णन में उनके चरित्र के अनुसार शृंगार व वस्त्राभूषणों का विस्तृत वर्णन, उनके संवादों में भाषा के भेद के साथ-साथ आवश्यक भावभंगिमाओं का उल्लेख पाठकों को बाँधे रखता है। किताब पढ़ते - पढ़ते पाठक सहज ही मगध की राज व्यवस्था, मन्त्रिमण्डल, सेना , न्याय व्यवस्था, आन्तरिक सुरक्षा, गुप्तचर व अन्य विभागों के सभी महत्वपूर्ण आमात्यों, पदाधिकारियों व उनके दायित्वों से परिचित हो जाता है जिसे इतिहास की किताब से पढ़कर याद करना बड़ा कठिन कार्य होता है। यह लेखक की विद्वत्ता ही है कि जहाँ एक पृष्ठ पर ब्रह्मा जी, शिव जी, देवराज इंद्र, देवगुरु बृहस्पति और आचार्य शुक्र की दण्डनीतियों, श्रेष्ठ राज व्यवस्था व श्रेष्ठ राजा कैसा होना चाहिए इसपर विमर्श चल रहा है तो अगले ही पृष्ठ पर स्त्री सौंदर्य में दाँतो का महत्व और दंतक्षत के प्रकार क्या - क्या हैं ?; इस पर।
पुस्तक के ऐतिहासिक उपन्यास होने के कारण यह बाध्यता है कि उसमें कोई तथ्यात्मक त्रुटि न हो अतः सिकन्दर के विजय अभियानों में जिस प्रकार पर्शिया, अनातोलिया, इराक, बेबीलोन, निनेवा, बैक्ट्रिया, सुग्ध आदि की भौगोलिक स्थिति, भारत भूमि में गांधार, कैकेय, अभिसार, अश्मक, वाहीक, ग्लुचुकायन, अम्बष्ठ, शिवि, कठ, यौधेय, आग्रेय, ब्राह्मणक, शूद्र, मालव, क्षुद्रक, मल्ल आदि के प्राचीन व वर्तमान नामों, सतलुज, रावी, झेलम, चिनाब, व्यास व गङ्गा आदि नदियों की दिशाओं व दूरियों की शुद्धता व मानचित्र पर उनकी शुद्ध स्थिति का अंकन अत्यंत प्रशंसनीय है। किताब की विशेषताओं में यह भी है कि यह केवल एक नीरस कथा ही कहते हुए नहीं चलती, अपितु स्थान - स्थान पर मुख्य कथानक की स्थापना के लिए आवश्यक सहयोगी कथाएँ भी हैं जो कहीं से भी बल पूर्वक आरोपित नहीं प्रतीत होती हैं। विभिन्न स्थानों पर लेखक ने विभिन्न ललित कलाओं, रत्नों, सुराओं व विद्याओं का बड़ा विशद वर्णन किया है जो कि पाठकों के ज्ञान में वृद्धि तो करता ही है साथ ही लेखक की उन विषयों की गूढ़ समझ और ज्ञान को भी दर्शाता है। उदाहरण स्वरूप यदि सिकन्दर के आक्रमण को ही लिया जाय तो सामान्यत: लोग केवल उसके पुरु / पर्वतेश्वर / पोरस से हुए युद्ध के विषय में जानते हैं और उसमें भी बहुत थोड़े लोगों को ही उस युद्ध में दोनों पक्षों द्वारा प्रयुक्त सेनाओं, शस्त्रों, व्यूहों, रणनीतियों के विषय में पता होगा, दोष लोगों का भी नहीं है; अधिकतर देखा गया है कि साहित्यकार और असैनिक इतिहासकार इतिहास के मूल अवयव 'युद्धों' के साथ बड़ा अन्याय करते हैं, उन्हें या तो अतिरंजित कर देंगे या फिर दो - चार पंक्तियों में समेट देंगे। किंतु यहाँ लेखक ने अपने उपन्यास के इस महत्वपूर्ण विषय के साथ पूर्ण न्याय किया है। यूनानी युद्ध कला, उनके शस्त्रास्त्रों, उनकी व्यूह रचनाओं, उनकी सेनाओं के प्रकार, यूनानी सैन्य संचालन के साथ भारतीय युद्ध कला, चतुरंगिणी सेना के प्रकार, आक्रमण व सुरक्षा के लिए की जाने वाली भिन्न-भिन्न प्रकार की किलेबन्दी, भली प्रकार से रक्षित दुर्गों को भेदने की कलाएँ और आमने - सामने के खुले मैदान में युद्ध के संचालन की विधियों का विस्तृत वर्णन किया है। इसके साथ - साथ युद्ध में विजय के लिए अतिआवश्यक भिन्न - भिन्न प्रकार की मन्त्र युद्ध शैलियों, आचार्य शुक्र की औशनस नीति, आचार्य मनु की मानव नीति आदि का भी उल्लेख है। कैकेयराज की रथ सेना और हस्ति सेना के विरुद्ध सिकन्दर द्वारा अपनाए गए Phalanx Formation (वज्र व्यूह), अन्य राजाओं के साथ युद्धों में Horse Shoe Trap ( अर्द्ध चन्द्र व्यूह ) का प्रयोग और उसके इन व्यूहों के प्रतिकार में कठों की चक्र शकट व्यूह रचना और इन सभी का वर्णन करते समय इन बातों का ध्यान रखा गया है कि विभिन्न सेना-विभागों में कौन-सा विभाग किस स्थान पर किस संख्या में होगा और कौन-कौन-से सेनानायक किन-किन मुख्य स्थानों पर खड़े रहकर सैन्य-संचालन करेंगे, आदि। इन सब बातों को खूब सोच-विचारकर आक्रमण एवं बचाव दोनों प्रकार की कार्यवाहियों का कुशल वर्णन करने में लेखक की कलम कहीं भी संकीर्ण नहीं हुई है और न ही कहीं कोई अतिरंजना दिखाई देती है। भारतीय ऐतिहासिक उपन्यासों में युद्धों का ऐसा सजीव चित्रण अभीतक केवल वृन्दावन लाल वर्मा द्वारा रचित 'विराटा की पद्मिनी' और 'झाँसी की रानी' में ही दिखाई देता है अन्यत्र कहीं नहीं।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसमें वर्णित इतिहास से पाठक स्वंय को दूर नहीं पाता है। मूल कथानक से कहीं भी न भटकते हुए लेखक ने उन सभी कारणों का भलीभाँति उल्लेख किया है जो कि हम भारतीयों की सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठताओं के बाद भी सदा से विदेशियों द्वारा पराजय और पतन का कारण बनते आये हैं और चन्द्रगुप्त का विभिन्न संघर्षो के पश्चात सिंहासनारूढ़ होने और सेल्यूकस की पराजय तक की यात्रा में उन सभी कारणों का निदान क्या है ?, यह भी विधिवत स्पष्ट हो जाता है। पुस्तक के ऐतिहासिक उपन्यास होने के कारण इसमें भू - राजनीति, शासकीय राजनीति, कूटनीति, वीरता, छल, प्रतिशोध, दु:स्साहस, कला - संस्कृति आदि सभी के रस सम्मिलित हैं और इन सभी का पाठकों को रसास्वादन कराने के में लेखक द्वारा कहीं से कोई कृपणता नहीं की गई है। लेखक ने इसमें ऐसे समाजों और व्यक्तियों का चित्रण किया है जो सदा के लिए विलुप्त हो चुके हैं लेकिन उस वर्णन में कहीं से भी कोई ऐतिहासिक अनौचित्य नहीं है।
उपन्यास के तत्वों की दृष्टि से देखें तो एक तत्व होता है 'उद्देश्य'। यहाँ इस उपन्यास के उद्देश्य के लिये स्वामी विवेकानंद के एक व्यक्तव्य का उद्धरण ही पर्याप्त होगा। उन्होंने सन्यासी रूप में भारत का भ्रमण करते हुए, अलवर में अपने शिष्यों से कहा था कि आज तक भारत का इतिहास विदेशियों ने ही लिखा है। भारत का इतिहास अव्यवस्थित है। उसमें कालक्रम परिशुद्ध और यथार्थ नहीं है। अंग्रेजो तथा अन्य विदेशियों द्वारा लिखा गया इतिहास हमारे मनोबल को तोड़ने के लिए ही है। वह हमें दुर्बल ही बनाएगा। वे हमें हमारे दोष ही बताते हैं। जो विदेशी, हमारे तौर-तरीक़े, रीति-रिवाज, हमारे धर्म और दर्शन को बहुत कम समझते हैं, वे हमारा वास्तविक और पूर्वाग्रहरहित इतिहास कैसे लिख सकते हैं ? इसीलिए उसमें अनेक भ्रांतियाँ घर कर गई हैं। अब यह हमारे लिए है कि हम अपना स्वतंत्र मार्ग खोजें। अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें, शोध करें; और परिशुद्ध, यथार्थ, सहानुभूतिपूर्ण तथा आत्मा को उद्दीप्त कर देने वाला इतिहास लिखें। और यह ऐतिहासिक उपन्यास अपने उपरोक्त उद्देश्य की कसौटी पर शत प्रतिशत खरा उतरता है।
- गौरव सिंह