गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

बागी

वह बागी था! गुलाम, पराधीन, परतन्त्र भारत का पहला बागी। जब सारे राजे - रजवाड़े, सूरमा, योद्धा या तो अंग्रेज़ो की दासता में मस्त थे या फिर अपने हित के लिए संघर्ष रत; तब उसने सबके लिए पहली गोली दागी थी, उसे अंग्रेजो ने जब फाँसी देनी चाही तो पूरे कलकत्ते में कोई जल्लाद नहीं मिला जो उसे फाँसी पर लटकाने को प्रस्तुत हो। उसके बाद उसके सगे-सम्बन्धियों को अंग्रेजों ने तोप के मुँह पर बाँध कर उड़ा डाला लेकिन उसके बलिदान ने हिंदुस्तानी सैनिकों में विद्रोह की वह अग्नि भर दी कि उन्होंने गोलियां खत्म होने पर जँगली पौधे 'Canna Indica' (सर्वज्जय, कर्दळ, केंळें फुल) के बीज बन्दूकों में भरकर लड़ाई लड़ी और यह पौधा 'Indian shot' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। बलिया के नगवां गाँव में १९ जुलाई १८२७ को जन्मे उस भूमिहार ब्राह्मण हिन्दू युवक ने जब १८४९ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की बंगाल प्रेसिडेंसी आर्मी ज्वॉईन की थी तो किसने सोचा था कि एक दिन वही स्वतंत्रता के यज्ञ में पहला हविष्य डालेगा। कुछ लोग और इतिहासकार कहते हैं कि ५७ की क्रांति धार्मिक कारणों से और व्यक्तिगत लाभों के लिए थी। वे यह भूल जाते हैं कि ५७ के विद्रोह की पहली गोली उसने उसी एनफील्ड राईफल से दागी थी और जैसे ही उसने चर्बीदार कारतूस अपने मुँह से काटकर बन्दूक भरी; वह विद्रोह सैनिक, धार्मिक या व्यक्तिगत लाभ का न रहकर देश की स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम बन गया था। उसके बलिदान के बाद सन् ५७ के बागी सिपाही उसके उपनाम ' पाण्डे ' से जाने जाते थे और गर्व महसूस करते थे। ५७ की क्रांति के उस पुरोधा का परिचय यह रहा -

नाम - मंगल पाण्डेय, सिपाही नम्बर - १४४६, ५ वीं कम्पनी, १९ वीं पलटन/बटालियन, ३४ बंगाल नेटिव इन्फैंट्री रेजिमेंट, मुकाम - बैरकपुर छावनी, बंगाल कमांड, कलकत्ता। भारतीय स्वातन्त्र्य समर के अग्रदूत अमर बलिदानी स्वर्गीय मङ्गल पाण्डेय की पुण्यतिथि पर उन्हें कृतज्ञ हृदय से श्रद्धांजलि ! 🇮🇳🇮🇳

अभ्युत्थानम्

उपन्यास सरस ललित गद्य वृहत्कथाओं का साहित्य प्रेमियों द्वारा रसास्वादन करने का एक मात्र साधन है। अब ये सरस ललित वृहद गद्यकथाएँ काल्पनिक हैं ...